Sunday, 3 September 2017

आदर्श नहीं मुस्कान लाने की कोशिश

       'कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो..." जी हां, यह चंद अल्फाज भर नहीं। इसमें इच्छाशक्ति की प्रबलता दिख रही। 

   बात चाहे शहरों को स्मार्ट बनाने की हो या गांव को आदर्श रुप-रंग देने की नीति-नियति हो या फिर आंगनवाड़ी केन्द्रों को व्यवस्थाओं की विस्तृतता देने की हो। देश में लाखों आंगनवाड़ी केन्द्र संचालित हैं लेकिन अधिसंख्य आंगनवाड़ी केन्द्र तमाम कोशिशों के बावजूद सार्थक आयाम नहीं ले सके। शिक्षा व पोषकता को रेखांकित करने वाले आंगनवाड़ी केन्द्र खुद को सीमित दायरे से बाहर नहीं ला सके। हालांकि शासन-सत्ता ने इन आंगनवाड़ी केन्द्रों को समृद्ध बनाने की कोशिश की लेकिन अधिसंख्य आंगनवाड़ी केन्द्र संचालकों-व्यवस्थापकों के रोजी-रोटी व कमाने-खाने के धंधे बन गये। ऐसा नहीं कि आंगनबाड़ी के गोरखधंधे से शासन-सत्ता व नीति-नियंता बेखबर हों।
     शायद, इसीलिए आंगनवाड़ी केन्द्रों को अब गरीब-गुरबा व कमजोर वर्ग का 'शक्तिदाता" बनाने की कोशिश होती दिख रही है। शासकीय व्यवस्थाओं से कहीं अधिक विश्वास निजी संस्थाओं पर दिख रहा है। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस मिशन में वेदांता को सहयोगी बनाने की कोशिश की है। जिससे 'नेक्स्ट जेनेरेशन" को वाकई शक्तिवान बना सके। 
      भारत सरकार का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय व वेदांता संयुक्त तौर से मलिन बस्तियों से लेकर गरीबों की आबादी में शिक्षा, तकनीकि व स्वास्थ्य की नई इबारत गढ़ेंगे। गरीब को गरीबी से उबारने आैर उसे स्वस्थ्य बनाने के मकसद से सरकार व निजी क्षेत्र ने हाथ मिलाये हैं। फिलहाल 'अगली पीढ़ी" के लिए चार हजार आंगनवाड़ी केन्द्र 'शक्तिदाता" बनेंगे। इस मिशन पर करीब चार सौ करोड़ खर्च होंगे। 
       यह आदर्श आंगनवाड़ी केन्द्र वास्तविक शक्तिदाता के रुप में होंगे। इसमें स्वस्थ्य एवं शिक्षित भारत की परिकल्पना को साकार करने की कोशिश की जायेगी। एक ऐसा परिवेश गढ़ने का ताना-बाना बुना जायेगा जिसमें बच्चों की शिक्षा हो, बालिकाओं-महिलााओं का सशक्तिकरण हो, विकास के लिए सामूहिक सहभागिता हो, गरीबी उन्मूलन की व्यवस्थायें हों, कुपोषण को हटाने-मिटाने की व्यवस्थायें हों। 
        आशय यह कि एक समृद्ध राष्ट्र दिखे। शिक्षा केवल कहने के लिए शिक्षा न हो बल्कि शिक्षा का स्तर भी गुणवत्तापूर्ण हो। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एवं वेदांता के संयुक्त प्रयास से खुलने वाले यह चार हजार आदर्श आंगनवाड़ी केन्द्र फिलहाल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, महाराष्ट्र, ओडिसा, राजस्थान, तेलंगाना आदि प्रांतों में खुलेंगे। 
       बहुआयामी क्षमताओं वाले यह आदर्श आंगनवाड़ी केन्द्र पच्चीस से तीस के क्लस्टर्स में बनेंगे। भूमि की व्यवस्था का उत्तरदायित्व स्थानीय निकाय एवं ग्राम पंचायतों का सौंपा गया है। खास बात यह है कि आंगनवाड़ी की मौजूदा व्यवस्थाओं में इंफारमेशन टेक्नॉलॉजी से लेकर कौशल विकास की बेहतर व अपेक्षित व्यवस्थायें होंगी जिससे यह आदर्श आंगनवाड़ी केन्द्र केवल शो पीस बन कर न रह जायें। ई-लर्निंग शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता को बेहतर बनायेगी तो वहीं कौशल विकास रोजी-रोजगार के अवसर विकसित करेगा। 
    रोग प्रतिरक्षण की व्यवस्थायें सुनिश्चित होंगी तो वहीं संवेदनशीलता एवं भावनात्मकता से भी समुदाय को आपस में जोड़ने की कोशिश होगी। स्वास्थ्य की अपेक्षित देखभाल के रूप में भी यह केन्द्र काम करेंगे। विशेषज्ञों की मानें तो कोशिश है कि जीवन को उच्चस्तरीय व कौशल सम्पन्न बनाया जाये जिससे महिला हों या पुरुष भविष्य में किसी पर निर्भर न रहें। 
      शायद इसी लिए आदर्श आंगनवाड़ी केन्द्र में पचास प्रतिशत समय शिक्षा व्यवस्था पर केन्द्रीत होगा तो वहीं पचास प्रतिशत समय कौशल विकास की प्रबलता को दिया जायेगा। अब कौशल विकास को देखें तो अब तक 38.32 लाख लोगों को आवास के साथ ही कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जा चुका है। हालांकि कौशल विकास की यह योजनायें कोई नयी नहीं है। वर्ष 1997 में शहरी गरीबों के लिए स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना व राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन प्रारम्भ की गयीं थीं।
       गौरतलब है कि कौशल विकास की यह योजनायें करीब दो दशक से चली आ रहीं हैं। नीति-नियंताओं की कोशिश होनी चाहिए कि कौशल विकास प्रशिक्षण यथार्थ में हो क्योंकि तभी उसकी सार्थकता होगी, जब व्यक्ति उस प्रशिक्षण के लाभार्थ रोजी रोजगार हासिल कर सके। परिवार का भरण-पोषण कर सके। शायद यह कोशिश आदर्श आंगनवाड़ी केन्द्र के जरिये हो रही है। 
     कौशल विकास प्रशिक्षण पर गौर करें तो पायेंगे कि इसमें मध्य प्रदेश पूरे देश में अग्रणी रहा। मध्य प्रदेश ने 5.06 लाख व्यक्तियों को कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया। इसके बाद महाराष्ट्र में 4.86 लाख, उत्तर प्रदेश में 4.51 लाख, कर्नाटक में 4.08 लाख, तमिलनाडु में 3.33 लाख, आंध्र प्रदेश में 3.25 लाख, गुजरात में 2.22 लाख, बिहार में 2.11 लाख, पश्चिम बंगाल में 1.98 लाख, राजस्थान में 1.07 लाख युवाओं को कौशल विकास प्रशिक्षण दिया गया। 
      कौशल विकास प्रशिक्षण पर गौर करें तो देखेंगे कि चाहे गुजरात हो या बिहार, पश्चिम बंगाल व राजस्थान अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक पीछे रहे। शायद, इन सभी कारणों को देखते हुये भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों को निजी क्षेत्र-निजी संस्थाओं से हाथ मिलाने पड़े। नीतियां बनाने व अपेक्षित धनराशि उपलब्ध कराने से ही परिणाम फलीभूत नहीं हो जाते।
      इसके लिए आवश्यक होगा कि पात्र व्यक्ति को नीति एवं योजनाओं का लाभ अवश्य मिले। इतना ही नहीं नीति व योजनाओं की अपेक्षित जानकारी भी समाज के निचले स्तर तक आसानी से पहंुचे क्योंकि जब दलित, गरीब, किसान व मजदूर के घर का चुल्हा आसानी से जल सकेगा, तभी नीति-नियंताओं की कुशलता साबित हो सकेगी।

Friday, 1 September 2017

डिजिटल भारत में मोबाइल व ई-बैंकिंग से वित्‍तीय समावेशन

       प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि वित्‍तीय समावेशन एक ऐसा मार्ग है जिस पर सरकारें आम आदमी को अर्थव्‍यवस्‍था के औपचारिक माध्‍यम में शामिल करके ले जाने का प्रयास करती है ताकि यह सुनिश्‍चित किया जा सके कि अंतिम छोर पर खड़ा व्‍यक्‍ति भी आर्थिक विकास के लाभों से वंचित न रहे तथा उसे अर्थव्‍यवस्‍था की मुख्‍यधारा में शामिल किया जाए और ऐसा करके गरीब आदमी को बचत करने, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों में सुरक्षित निवेश करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाता है तथा उधार लेने की आवश्‍कता पड़ने पर वह उन्‍हीं औपचारिक माध्‍यमों से उधार भी ले सकता है। 

   प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि वित्‍तीय समावेशन का अभाव होना समाज एवं व्‍यक्‍ति दोनों के लिए हानिकारक है। जहां तक व्‍यक्‍ति का संबंध है, वित्‍तीय समावेशन के अभाव में, बैंकों की सुविधा से वंचित लोग अनौपचारिक बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ने के लिए बाध्‍य हो जाते हैं, जहां ब्‍याज दरें अधिक होती हैं और प्राप्‍त होने वाली राशि काफी कम होती है। चूंकि अनौपचारिक बैंकिंग ढांचा कानून की परिधि से बाहर है, अत: उधार देने वालों और उधार लेने वालों के बीच उत्‍पन्‍न किसी भी विवाद का कानूनन निपटान नहीं किया जा सकता।
       प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि जहां तक सामाजिक लाभों का संबंध है, वित्‍तीय समावेशन के फलस्‍वरूप उपलब्‍ध बचत राशि में वृद्धि होती है, वित्‍तीय मध्‍यस्‍थता की दक्षता में वृद्धि होती है, तथा नए व्‍यावसायिक अवसर प्राप्‍त करने की सुविधा प्राप्‍त होती है। 
     प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि इस परिस्थिति में सरकार द्वारा प्रायोजित सर्वसुलभ बैंकिंग प्रणाली के कारण अधिक प्रतिस्‍पर्धी बैंकिंग परिवेश की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक आर्थिक विविधीकरण में योगदान प्राप्‍त हुआ है। 1980 और 1990 के दशकों में शुरू किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों से वित्‍तीय बाजार के सुधार के लाभ अनेक विकासशील देशों में पहुंचे। 20वीं शताब्‍दी के आरंभ में भारत में बीमा कंपनियां (जो जीवन बीमा और साधारण बीमा योजनाएं चलाती थीं) और एक कार्यशील स्‍टॉक एक्‍सचेंज काम कर रहा था। 
    प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि वित्‍तीय समावेशन का कार्यक्षेत्र केवल बैंकिंग सेवाओं तक ही सीमित नहीं है बल्‍कि यह समान रूप से बीमा, इक्‍विटी उत्‍पादों और पेंशन उत्‍पादों आदि जैसी अन्‍य वित्‍तीय सेवाओं के संबंध में भी लागू होता है। अत: वित्‍तीय समावेशन का अर्थ बैंकिंग सेवा से वंचित किसी भी क्षेत्र में स्‍थित किसी शाखा में केवल एक बैंक खाता खोलना ही नहीं है। 
   प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि आम आदमी को अर्थव्यवस्‍था की मुख्‍यधारा में शामिल करने से अनेक अन्‍य लाभ भी हैं तथा इससे एक ओर जहां समाज में कमजोर तबके के लोगों को उनके भविष्‍य तथा कष्‍ट के दिनों के लिए धन की बचत करने, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों जैसे कि बैंकिंग सेवाओं, बीमा और पेंशन उत्‍पादों आदि में भाग लेकर देश के आर्थिक क्रियाकलापों से लाभ प्राप्‍त करने के लिए प्रोत्‍साहन प्राप्‍त होता है, वहीं दूसरी ओर इससे देश को पूंजी निर्माण की दर में वृद्धि करने में सहायता प्राप्‍त होती है और इसके फलस्‍वरूप देश के कोने-कोने से होकर धन के प्रवाह से अर्थव्‍यवस्‍था को गति मिलती है और आर्थिक क्रियाकलापों को भी संवर्धन प्राप्‍त होता है। 
      प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि देश के जो लोग वित्‍तीय दृष्‍टि से मुख्‍यधारा में शामिल नहीं हुए हैं, वे प्राय: अपनी बचत/अपना निवेश भूमि, भवन और बुलियन आदि जैसी अनुत्‍पादक आस्‍तियों में लगाते हैं। जबकि वित्‍तीय दृष्‍टि से अर्थव्‍यवस्‍था की मुख्‍यधारा में शामिल हो चुके लोग ऋण सुविधाओं का आसानी से उपयोग कर सकते हैं, चाहें वे लोग संगठित क्षेत्र में काम कर रहे हों अथवा असंगठित क्षेत्र में, शहरी क्षेत्र में रहते हों अथवा ग्रामीण क्षेत्र में। सूक्ष्‍म वित्‍तीय संस्‍थाएं (एमएफआई) गरीब लोगों का आसान एवं सस्‍ती ब्‍याज दरों पर ऋण देने के सर्वाधिक सुलभ उदाहरण हैं और इस क्षेत्र में इन संस्‍थाओं ने अनेक सफलताएं प्राप्त की हैं। 
      प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि वित्‍तीय समावेशन से सरकार को सरकारी सब्‍सिडी तथा कल्‍याणकारी कार्यक्रमों में अंतराल एवं हेरा-फेरी पर भी रोक लगाने में भी मदद मिलती है क्‍योंकि इससे सरकार उत्‍पादों पर सब्‍सिडी देने के बजाय सब्‍सिडी की राशि सीधे लाभार्थी के खाते में अंतरित कर सकती है। वास्‍तव में, इससे सरकार को सब्‍सिडी के बिल में लगभग 57,000 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि की बचत हुई है और इससे सब्‍सिडी का लाभ सीधे वास्‍तविक लाभभोगी तक पहुंचना सुनिश्‍चित हुआ है। 
      प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि एनडीए की सरकार अपने कार्यकाल की शुरूआत से ही देश के हर व्‍यक्‍ति के वित्‍तीय समावेशन पर विशेष बल देने के लिए प्रतिबद्ध है। इस सरकार द्वारा किए गए अनेक उपायों में जैम-जनधन, आधार और मोबाइल सुविधा उपलब्‍ध कराना सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है। 
      प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि जनधन योजना- बैंकिंग सेवाओं की पहुंच में वृद्धि करने और यह सुनिश्‍चित करने के लिए कि सभी परिवारों के पास कम से कम एक बैंक खाता हो, 15 अगस्‍त, 2014 को स्‍वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए भाषण में प्रधानमंत्री जनधन योजना नामक राष्‍ट्रीय वित्‍तीय समावेशन मिशन की घोषणा की गई तथा इस स्‍कीम को 28 अगस्‍त, 2014 को औपचारिक रूप में शुरू किया गया। शुरू किए जाने के एक पखवाड़े के भीतर ही, रिकार्ड संख्‍या में बैंक खाते खोले जाने के आधार पर यह स्‍कीम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने में सफल रही। 
       अगस्‍त, 2017 के मध्य तक इस स्‍कीम के अंतर्गत 29.48 करोड़ खाते खोले गए जो एक बड़ी उपलब्‍धि है तथा इन खातों में से 17.61 करोड़ खाते ग्रामीण/अर्द्धशहरी क्षेत्रों और शेष 11.87 करोड़ खाते शहरी क्षेत्रों में खोले गए। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि जनधन योजना के तहत खाता खोलने पर मिलने वाले अतिरिक्‍त लाभ ये हैं कि ग्राहक को एक रुपे डेबिट कार्ड जारी किया जाता है जिसमें 1 लाख रुपये का बीमा कवर दिया जाता है। इसके अतिरिक्‍त, खाते को छ: महीने तक संतोषजनक रूप में संचालित करने पर ग्राहक को 5,000 रुपये की ओवर ड्राफ्ट सुविधा प्रदान की जाती है। 
     ग्राहकों को एक विशेष समय तक खाता खोलने के लिए 30,000 रुपये का जीवन बीमा भी दिया गया है। यह स्‍कीम बहुत सफल रही है और इस स्‍कीम के अंतर्गत दिसंबर 2016 तक सर्वेक्षण किए गए 21.22 करोड़ परिवारों में से 99.99 प्रतिशत परिवारों को कवर किया गया है। 44 लाख से अधिक खातों को ओडी सुविधा मंजूर की गई है जिसमें से लगभग 300 करोड़ की राशि से 23 लाख से अधिक खाताधारकों ने इस सुविधा का उपयोग किया है। 
     प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि बीमा और पेंशन स्‍कीम- सभी नागरिकों और विशेषकर गरीब और सुविधा रहित लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए, वर्तमान सरकार ने प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और प्रधानमंत्री जीवन ज्‍योति बीमा योजना शुरू की है।
       प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि पूर्व की स्‍कीम अर्थात प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीआई) 18 से 70 वर्ष के आयु समूह को कवर करती है और केवल 12 रुपये वार्षिक के वहनीय प्रीमियम पर 2 लाख रुपये का जोखिम कवर प्रदान करती है। इस स्कीम के तहत 12 अप्रैल, 2017 के तक लगभग 10 करोड़ कुल नामांकन दर्ज किए गए। 
        प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि बाद की स्‍कीम अर्थात प्रधानमंत्री जीवन ज्‍योति बीमा योजना 18 से 50 वर्ष के आयु समूह को कवर करती है, जिनके पास बैंक खाते हैं। किसी भी कारण से बीमाशुदा व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु होने पर 2 लाख रुपये का जीवन कवर बीमाशुदा व्‍यक्‍ति के आश्रित को प्रदान किया जाता है। इस स्कीम के तहत 12 अप्रैल, 2017 तक, लगभग 3.10 करोड़ से अधिक व्‍यक्‍तियों का नामांकन किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि अटल पेंशन योजना- यह स्‍कीम 2015 में 18 से 40 आयु वर्ग के सभी खाताधारकों के लिए शुरू की गई और वे पेंशन राशि के आधार पर भिन्‍न अंशदान चुन सकते हैं। 
        इस स्‍कीम के अंतर्गत अभिदाता को मासिक पेंशन की गारंटी प्रदान की जाती है और उसके बाद उसके जीवन साथी को तथा उनकी मृत्‍यु के बाद उनके बच्‍चों को, 60 वर्ष की आयु तक संचित पेंशन कार्पस को, अभिदाता के नामिती को वापस कर दिया जाता है। केंद्र सरकार भी अंशदान के 50 प्रतिशत का योगदान करती है, बशर्ते कि वह 1000 रुपये प्रतिवर्ष से अधिक न हो। 31 मार्च, 2017 तक लगभग 46.80 लाख अनुमोदनकर्ता इस योजना के साथ जुड़े। 
         प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि वरिष्‍ठ पेंशन बीमा योजना: वे सभी अभिदाता जिन्‍होंने 15 अगस्‍त, 2014 से 14 अगस्‍त, 2015 तक वीपीबीवाई में अभिदान किया है, उन्‍हें नीति के तहत 9 प्रतिशत का सुनिश्‍चित गारंटी रिर्टन मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री मुद्रा योजना- यह स्‍कीम गैर-कारपोरेट लघु व्‍यापार क्षेत्र को औपचारिक वित्‍तीय सुविधा पहुंच प्रदान करने के लिए अप्रैल 2015 में शुरू की गई। इस स्‍कीम का मुख्‍य उद्देश्‍य भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के गैर वित्‍तपोषित क्षेत्र को प्रोत्‍साहित करना एवं बैंक वित्‍तपोषण सुनिश्‍चित करना है।
       मुद्रा योजना के तहत, इसके प्रारंभ से लेकर 13 अगस्त, 2017 तक कुल लगभग 8 करोड़ 70 लाख ऋण दिए गए जिसमें से लगभग 6 करोड़ 56 लाख महिलाएं थीं। इस योजना के तहत लगभग 3 लाख 75 हजार करोड़ रुपए (जिसमें से लगभग 1 लाख 88 हजार करोड़ रुपए महिलाओं को) की राशि के ऋण स्वीकृत किए गए जिसमें से लगभग 3 लाख 63 हजार करोड़ रुपए (जिसमें से लगभग 1 लाख 66 हजार करोड़ रुपए महिलाओं को) के ऋण वितरित किए जा चुके हैं। 
     प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि वन सुरक्षा बंधन योजना; सुकन्‍या समृद्धि योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, सामान्‍य क्रेडिट कार्ड और भीम ऐप शामिल है। एटीएम और और व्‍हाइट लेबल एटीएम की नीतियों का उदारीकरण किया गया है। एटीएम के नेटवर्क का विस्‍तार करने के लिए आरबीआई ने गैर-बैंक संस्‍थाओं को एटीएम (''व्‍हाइट लेबल एटीएम कहलाता है'') शुरू करने की अनुमति दी है। अभी तक देश में 64.50 करोड़ डेबिट कार्डों में से रुपे कार्ड ने बाजार हिस्‍से में 38 प्रतिशत (250 एमएम) की त्‍वरित वृद्धि की है। पीएमजेडीवाई (170 मिलियन) खाता धारकों को कार्ड प्रदान किए गए हैं। 
         प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि आरबीआई के अनुरोध पर वाणिज्‍यिक बैंकों द्वारा वित्‍तीय उत्‍पादों तक जनता की पहुंच हेतु जागरूकता और शिक्षा प्रदान करने के लिए वित्‍तीय जागरूकता केंद्र शुरू किए गए हैं। यहां आरबीआई की नीति है कि वित्‍तीय समावेशन वित्‍तीय साक्षरता के साथ-साथ चलना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि आधार और बैंक खातों की सहायता से प्रत्‍यक्ष लाभ अंतरण एक बहुत बड़ी घटना है जो जनता को नए खोले गए खातों के साथ सक्रिय और संपर्क में रखती है। 
       प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि स्‍टेंड-अप इंडिया- एससी, एसटी महिला उद्यमियों द्वारा ग्रीनफील्‍ड उद्यमों के लिए 10 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये तक के बैंक ऋण और पारिवारिक सहायता प्रदान करने के लिए शुरू किया गया। अगस्त 2017 के मध्य तक 38,477 ऋण धारकों को लगभग 8,277 करोड़ रुपए के ऋण वितरित किए जा चुके हैं जिसमें से लगभग 31 हजार महिलाओं को बांटी गई राशि 6,895 करोड़ रुपए थीं। 
     प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि देश में वित्तीय समावेशन को और अधिक मजबूत करने के लिए सरकार ने बैंकों को ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रो एटीएम स्‍थापित करने की सलाह दी है, परिणामस्‍वरूप,- दिसंबर 2016 तक 1, 14, 518 माइक्रो एटीएम स्‍थापित किए गए। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि वैंचर कैपिटल स्कीम: इस स्कीम के तहत सरकार ने अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के लोगों को रोजगार मांगने के बजाए रोजगार देने की दिशा में प्रयत्न करते हुए इस स्कीम को प्रारंभ किया। 
        इस योजना में योग्य उद्यमियों को पहले 50 लाख रुपए से 15 करोड़ रुपए तक ऋण उपलब्ध कराया जाता था जिसकी सीमा बाद में 20 लाख रुपए से 15 करोड़ रुपए तक निर्धारित कर दी गई। इसमें सरकार ने अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को समर्थ बनाते हुए आत्मनिर्भरता प्रदान करते हुए अन्य लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में सक्षम बनाने का कार्य किया।
         इसमें 70 संस्थाओं के परियोजनाएं मंजूर किए एवं 265 करोड़ रुपए के फंड मंजूर किए जा चुके हैं और 40 संस्थाओं के ऋण वितरित किए जा चुके हैं। उल्लेखनीय यह है कि यह उद्यमकर्मी अपने साथ-साथ औसत 20-25 लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं।
       इसमें ब्याज की दर 10 प्रतिशत से घटाकर 8 प्रतिशत कर दी गई है। इस योजना का मूल मंत्र यह है कि अनुसूचित जाति/जनजाति के लोग रोजगार आश्रित न रहकर रोजगार उपलब्ध कराने में सक्षम बने।प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि सरकार वित्‍तीय प्रणाली में प्रत्‍येक परिवार के समावेशन के लक्ष्‍य के प्रति प्रतिबद्ध है ताकि जनता देश के विकास से प्राप्‍त विधिक लाभों को प्राप्‍त कर सके और साथ ही जनता से जुटाई गई निधियां जो पहले औपचारिक चैनल में नहीं थीं, इन्हें औपचारिक चैनल में लाया जा सके, जिससे देश की अर्थव्‍यवस्‍था को संबल प्राप्‍त हो और विकास पथ प्रशस्‍त हो सके। : वित्त एंव कोरपोरेट कार्य राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल

काश प्रधानमंत्री देश को गोद लेते

     काश प्रधानमंत्री देश को गोद ले लेते। जी हां, यह कोई कटाक्ष या व्यंग्य नहीं बल्कि हकीकत है कि देश को गोद ले लेते तो शायद देश की तस्वीर ही बदल जाती। 

     देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्र में सत्तासीन होते ही गांव का रंग-रंगत बदलने का खाका तैयार किया। यह खाका 'सांसद आदर्श ग्राम योजना" रहा। भले ही भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य दलों के सांसदों ने आदर्श ग्राम योजना को क्रियान्वित होने या अमल में लाने में कुछ देर की हो लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना को बनाने के साथ ही अमल में लाने की कोशिश रंगत लाते हुये दिखा दी। 
      दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह योजना देश के गांवों के समग्र विकास को लेकर है। हकीकत तो यही है कि 'असल भारत तो गांव में ही बसता है"। भारत सरकार ने 11 अक्टूबर 2014 को देश.... खास तौर से गांववासियों के लिए सांसद आदर्श ग्राम योजना लांच की। संसदीय क्षेत्र का कोई भी एक गांव चुनना आैर उसका अपेक्षित विकास करना-कराना सांसद के उत्तरदायित्व में शामिल कर दिया गया। 
       नीति-नियंताओं की सोच रही कि देश के छह लाख से अधिक गांव-गिरांव की पगडंड़ी से लेकर उसके गलियारों की रंगत बदली जाये। 'सांसद आदर्श ग्राम योजना" में फिलहाल ढ़ाई हजार गांव को आदर्श बनाने का लक्ष्य रखा गया। विषय विशेषज्ञों की मानें तो 'सांसद आदर्श ग्राम योजना" के तहत चयनित गांव को हर हाल में वर्ष 2016 तक पूर्ण व अपेक्षित विकास करने की रीति-नीति तय की गयी थी।
       वर्ष 2016 तक सांसद को एक गांव को पूर्ण विकसित करने के बाद अपेक्षित विकास के लिए संसदीय क्षेत्र के दो अन्य गांव का चयन कर उनको वर्ष 2019 तक विकसित करना-कराना है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र बनारस के जयापुुर गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत चयनित किया। बात जब प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र की हो तो.... चाहे भारत सरकार के अफसर हों या फिर प्रदेश सरकार के अफसर हों, स्वभाविक है कि सभी का ध्यान सांसद अंगीकृत गांव की ओर होगा।
     प्रधानमंत्री के चयनित गांव जयापुर गांव को निखारने में गुजराती समुुदाय-समाज का अपेक्षित सहयोग व योगदान रहा। बनारस मुख्यालय से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर तहसील राजा तालाब के निकट स्थित जयापुुर गांव आज देश-दुनिया में खास चर्चा में आ गया। करीब छह सौ परिवारों व चार हजार दो सौ आबादी वाला जयापुर गांव आज विकास की रोशनी से चकाचौंध दिखने लगा। 
      जयापुर गांव भले ही बहुत अधिक आबादी वाला न हो लेकिन गांव के बाशिंदों को बचत खाता से पैसा निकालने के लिए अब शहर की राह नहीं पकड़नी पड़ती क्योंकि गांव में ही अब तीन-तीन सरकारी बैंक व एटीएम हैं। एटीएम में कार्ड लगाइये आैर खरे-करारे नोट लेकर घर जाइये। एक एटीएम काम न करे तो दूसरा तो है। कभी मिट्टी के गली-गलियारों वाले जयापुर गांव की गलियां व सड़कें अब इण्टरलाकिंग टाइल्स से चमचमाती दिखती है।
      गांव के करीब 18 किलोमीटर लम्बे गली-गलियारों में कहीं इण्टरलाकिंग टाइल्स लगाने का कार्य चल रहा है तो कहीं पूरा हो चुका है। बताते हैं कि इण्टरलाकिंग की इन गली-गलियारों से चालीस टन वजन का कोई भी वाहन आसानी से गुजर जायेगा तो भी इन सड़कों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसी गांव के एक तीन सौ वर्ष पुराने पेड़ को संरक्षित करने की कोशिशें चल रही हैं। इतना ही नहीं नैतिकता व आदर्श का ज्ञान देने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम पर आधारित नाटक का मंचन भी किया गया।
       संदेश यह था कि राम का आदर्श अपनायें। गांव बदलेगा, समाज बदलेगा... देश बदलेगा। कहने का आशय यह है कि विकास केवल कंक्रीट तक ही सीमित न रहे। सामाजिक बदलाव भी दिखे। रोशनी के लिए जयापुुर में 135 सोलर लाइट्स लगे हैं। दर्जनों बायो टायलेट गांव में हैं लेकिन सफाई हो या रोशनी, अन्तर्मन तक हो। अभी देश के प्रधानमंत्री ने जानना चाहा कि उनके गोद लिये गांव जयापुुर में कितने पौधे लगाये गये आैर कितने घरों-परिवारों में बच्चियों ने जन्म लिया। 
       यह एक सामाजिक दृष्टि से दिखने वाला फैसला है। बेटी हो या पौधा दोनों की ही देखभाल आवश्यक है। भारतीय राजनीति के अन्य योद्धा समाजवादी पार्टी के मुखिया मुुलायम सिंह यादव ने भी अपनी सोच व इच्छाशक्ति से अपने गांव सैफई को राष्ट्रीय स्तर पर उभारा। सैफई में आज क्या नहीं है ? चाहे मेडिकल कालेज की बात हो या पब्लिक स्कूल की हो या चमचमाती सड़कों का संजाल हो।
     सभी कुछ तो है सैफई में। उत्तर प्रदेश के इटावा मुख्यालय से करीब बाइस किलोमीटर दूर सैफई में विशाल कृषक सभागार है तो पहलवानी से लेकर अन्य खेलकूद को प्रोत्साहित करने वाला विशाल मास्टर चंदगीराम स्टेडियम भी है। नहर इतनी साफ कि शायद प्रदेश में कहीं अन्य न दिखे। कभी एक छोटे से गांव के तौर पर जाना-पहचाने जाने वाला सैफई आज अपनी आगोश में हवाई पट्टी भी रखता है। 
       आशय यह है कि इच्छाशक्ति हो तो आप कुछ भी कर सकते हैं वर्ना बहाने तो हजार हैं। देश में ताकतवर व राष्ट्रीय राजनीति में अपना प्रभाव-दबदबा रखने वाले नेताओं की कोई कमी नहीं है। आईएएस, आईआरएस, आईपीएस सहित दर्जनाों प्रभावशााली सेवाओं से ताल्लुक रखने वाली हस्तियां हैं।
      बात चाहे राजनीति हस्तियों की हो या फिर प्रशासनिक हस्तियों की हो या फिर आैद्योगिक घरानों की हो.... इच्छाशक्ति हो तो कम से कम अपने गृह जनपद, गृह-गांव-गिरांव की तस्वीर आसानी से बदल सकते हैं। यह सब कुछ मुमकिन है शासकीय योजनाओं व शासकीय व्यवस्थाओं से.... बस केवल अपने दबाव-प्रभाव का जनहित में उपयोग करने की। 
       इसके बाद शायद कोई वजह न होगी कि देश के गांवों की तस्वीर न बदले। इच्छाशक्ति हो तो देश के छह लाख गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना न तो कोई बड़ी बात होगी आैर न ही नामुमकिन ही दिखेगा।

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