Wednesday, 28 June 2017

भारत के महाराजाओं के व्यक्तिगत जीवन की याद दिलाती महाराजा एक्सप्रेस

         महाराजा एक्सप्रेस 2010 से भारतीय रेल द्वारा चलाई जाने वाली एक विलासिता ट्रेन है।
     यह इंडियन रेलवे कैटरिंग एण्‍ड टूरिज़म कॉर्पोरेशन द्वारा एक संयुक्त उद्यम है। सभी समावेशी लागत को मिलाकर इसका हर टिकट 800 (लगभग 40000 रुपए) प्रति व्यक्ति प्रति दिन से लेकर 2,500 (लगभग 125000 रुपए) प्रति व्‍यक्ति प्रति दिन है। महाराजा एक्सप्रेस की चार यात्रा कार्यक्रम हैं जो ज्यादातर दिल्ली से शुरूआत करके आगरा तक जाती है। फिर यह भारत की अन्य हिस्सों में भी जाती है। वहाँ पर प्राचीन स्मारकों, विरासत स्‍थल, आदि के दर्शन किया जाता हैं। 
          इस ट्रेन में 23 डिब्बे हैं, जो भारत की महाराजाओं की व्यक्तिगत जीवन की याद दिलाती हैं। इस ट्रेन में दो अत्यधिक सुंदर भोजनालय, एक अवलोकन लाउंज, एक यादगार वस्तुओं की दुकान और रहने के लिए 43 शानदार केबिन हैं। इंडियन रेलवे कैटरिंग एण्‍ड टूरिज़म कॉर्पोरेशन और कॉक्स किंग्स इंडिया लिमिटेड, दुनिया के कुछ पुरानी यात्रा कंपनियों में से एक ने महाराजा एक्सप्रेस को चलाने के लिए एक संयुक्त उद्यम पर हस्ताक्षर किया।
           महाराजा एक्सप्रेस भारत की सबसे कीमती विलासिता ट्रेन है। 2010 में अंतर्राष्ट्रीय रेलवे यात्रियों की सोसायटी द्वारा ट्रेन पर आवास और भोजन की सुविधा, सेवा और बंद गाड़ी भ्रमण कार्यक्रम के लिए प्रशंसा की और 2011 में इसे विश्व की सबसे विलासिता वाली 25 ट्रेनों की सुची में नामित किया गया।
            एक्सप्रेस की चार यात्रा रॉयल इंडिया (8 दिन-7 रात्रि) दिल्ली-आगरा-रंथामबोर-जयपुर - बीकानेर-जोधपुर-उदयपुर - वडोदरा - मुम्बई, क्लासिकल इंडिया (7 दिन-6 रात्रि) दिल्ली - आगरा - ग्वालियर - खजुराहो - बांधवगढ़ - वाराणसी - लखनऊ - दिल्ली, प्रींसली इंडिया (8 दिन-7 रात्रि): मुंबई - वडोदरा - उदयपुर - जोधपुर - बीकानेर - जयपुर - रणथंभौर - आगरा - दिल्ली, रॉयल सजोर्ण (8 दिन- 7 रात्रि): दिल्ली - जयपुर - कोटा - रणथंभौर - आगरा - दिल्ली है।

अस्तित्व बचाने के लिए चुनौतियों का सामना कर रही राष्ट्रीय नदी गंगा

        राष्ट्रीय नदी गंगा अस्तित्व बचाने के लिए चुनौतियों का सामना कर रही थी। अस्तित्व पर संकट शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से पैदा होनें वाले सीवेज, व्यापारिक प्रदूषण व अऩ्य प्रदूषणों के कारण हुआ हैं। 

      गंगा पाँच राज्यों, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है और कुल 2525 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 8,61,404 वर्ग किलोमीटर है जो देश के कुल क्षेत्रफल का एक चौथाई है। देश की 46 प्रतिशत आबादी गंगा के जलग्रहण क्षेत्र में निवास करती है। यह पाँच राज्यों के 66 जिलों में फैले 118 शहरों तथा 1657 ग्राम पंचायतों से होकर बहती है। गंगा स्वच्छता राष्ट्रीय मिशन की शुरूआत जून 2014 में की गई। इस मिशन को उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के राज्य स्तरीय कार्यक्रम प्रबन्ध समूहों (एसपीएमजी) सहायता प्रदान करते हैं।
      नमामि गंगे योजना के अन्तर्गत सीवर और प्रदूषण प्रबन्धन, नए एसटीपी का निर्माण तथा पुराने एसटीपी का पुनर्वास, ग्राम पंचायतो की पूर्ण स्वच्छ्ता, आदर्श श्मशान घाट-धोबी घाट का निर्माण, जीआईएस स्तर पर निर्णय लेने की प्रणाली का विकास तथा निगरानी और सूचना प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी केन्द्र की स्थापना जो वास्तविक समय पर चेतावनी और पूर्वानुमान प्रदान कर सके जैसी प्रमुख गतिविधियां हैं। 
           लंबी अवधि के संरक्षण और पुनर्जीवन तथा ओ एण्ड एम के अन्तर्गत दस वर्षो के लिए सम्पत्तियों का निर्माण के लिए शत प्रतिशत धन राशि का प्रावधान किया गया है। जैव विविधता, संरक्षण, नदी के प्रवाह, नदी के दोनों किनारो पर औषधीय व स्थानीय पौधों का वनीकरण तथा जलीय जीवों के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। 
         नमामि गंगे योजना के पहले तीन वर्षों में (2014-15 से 2016-17) 3673 करोड़ रुपये की कुल धनराशि खर्च हुई है। चालू वित्त वर्ष (2017-18) में 2300 करोड़ रुपये की धनराशि बजट में आवन्टित की गई है। परन्तु यह देखा गया है कि धनराशि के उपयोग की गति संतोषजनक न है। निविदा में विलम्ब, पुनर्निविदा, जमीन की अनुपलब्धता, कानूनी मामले, प्राकृतिक आपदाएं, सड़क काटने की स्वीकृति में देरी, स्थानीय त्यौहार, अधिक कोष की आवश्यकता तथा राज्य सरकारों द्वारा की जाने वाली अनुशंसा में देरी आदि योजना के कार्यान्वयन की धीमी गति के प्रमुख कारण हैं। 
         आशा है कि संबंधित राज्य के साथ राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन की निरन्तर निगरानी बैठक से योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी और जमीन उपलब्धता तथा निविदा द्वारा योजना की शुरूआत जैसी बाधाओं को दूर किया जा सकेगा। भारत के गजट द्वारा 7 अक्टूबर 2016, को एक आदेश जारी किया गया जिसके तहत पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत आने वाले गंगा नदी (पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबन्धन) प्राधिकरणों को तेज गति से नीति निर्माण व कार्यान्वयन तथा एक नए संस्थागत संरचना निर्माण का प्रावधान है। 
            यह प्रावधान राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन को अपने कार्यों को स्वतन्त्र रूप से तथा जवाबदेही लेकर पूर्ण करने की शक्ति देता है। इस प्राधिकरण का अधिकार क्षेत्र पाँच राज्यों, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा गंगा व उसकी सहायक नदियों तक विस्तृत है।
          सम्पत्ति और जल की गुणवत्ता का समयबद्ध रख-रखाव और पुनर्स्थापना, जल ग्रहण क्षेत्र में लुप्त हो चुके पेड़ पौधों का पुनर्जीवन और प्रबन्धन, गंगा बेसिन में जलीय जीव और तटीय जैव विविधता का पुनर्जीवन और संरक्षण, गंगा के किनारों तथा इसके बाढ क्षेत्र में निर्माण पर प्रतिबन्ध ताकि प्रदूषण के स्रोत कम किया जा सके और भूमिगत जल की फिर से पूर्ति की जा सके, नदी के पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबंधन के लिए लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
            सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों तथा उद्योग निकायों के सहयोग से प्रमुख शहरों में गंगा नदी के तल की सफाई का कार्य प्रारम्भ किया जा चुका है। ग्रामीण स्वच्छता के तहत राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन ने पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को शौचालय निर्माण के लिए 263 करोड़ रुपये उपलब्ध कराये है। अब तक 11 लाख शौचालयों का निर्माण हो चुका है। 
          श्मशान घाटों के निर्माण व आधुनिकीकरण के लिए 20 से 25 शहरी स्थानीय निकायों के सहयोग से प्रतिवर्ष 100 श्मशान घाटों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। केदारनाथ, हरिद्वार, दिल्ली, इलाहाबाद, कानपुर, वाराणसी और पटना में नदी के किनारों-घाटों का विकास कार्य तथा वर्तमान के घाटों की मरम्मत और आधुनिकीकरण कार्य प्रारम्भ हो चुका है।
           अत्यधिक प्रदूषित करने वाले 764 में से 508 शराब, लुग्दी व कागज़, चमड़ा उद्योग, वस्त्र तथा चीनी के कारखानों के लिए वास्तविक समय पर जानकारी देने वाले प्रदूषण निगरानी केन्द्रों की स्थापना की गई है। यह प्रदूषण प्रबन्धन कार्य, मध्यम अवधि योजना के अऩ्तर्गत आरम्भ किया गया है। शराब के कारखानों के द्वारा शून्य द्रव निर्वहन के लिए कार्य योजना 2016 के अऩ्तिम तिमाही से लागू की गई है। 
           केन्द्रीय नियन्त्रण प्रदूषण बोर्ड से सतर्कता विभाग द्वारा बारीकी से निर्देशो के अनुपालन की निगरानी की जा रही है। भारत के वन्य जीव संस्थान के सहयोग से जैव विविधता संरक्षण को लागू किया गया है। जिसके अन्तर्गत स्वर्ण महशीर, डॉल्फ़िन, मगरमच्छ, कछुए और ओटर आदि का संरक्षण शामिल है। वनीकरण कार्यक्रम के तहत 30,000 हैक्टेयर भूमि का लक्ष्य रखा गया है। 
         जल की गुणवत्ता की निगरानी के लिए 57 निगरानी केन्द्रों के अलावा 113 वास्तविक समय निगरानी केन्द्रों की स्थापना की जा रही है जो कुछ निश्चित जगहों पर प्रदर्शन बोर्डों के माध्यम से जानकारी प्रदान करेंगें। पोस्टर, ब्रोशर, पर्चे, होर्डिंग आदि जैसे संसाधन सामग्रियों को हितधारकों के बीच प्रसारित-प्रदर्शित किया गया है। पैदल यात्रा, स्वच्छता अभियान, बच्चों के लिए पेंटिंग प्रतियोगिता, श्रमदान, टॉक-शो और संवाद आदि के माध्यम से जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है।
            एक नमामि गंगे गीत जारी किया गया है। इसके अतिरिक्त दृश्य-श्रव्य के माध्यम से भी जागरुकता फैलाई जा रही है। फेसबुक, ट्वीटर और यू ट्यूब जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों से अद्यतन जानकारी मुहैया कराई जा रही है। जन जागरूकता अभियान, फोटो प्रदर्शनियां, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में मंडप-स्टालों को लगाने की भी शुरुआत की गई है। गंगा नदी में प्रदूषण की निगरानी में जनता की भागीदारी के लिए ‘भुवन-गंग’ वेब ऐप और मोबाइल ऐप का शुभारम्भ किया गया है। 
           गंगा पुनर्जीवन चुनौती की प्रकृति को देखते हुए भारत सरकार के सात मंत्रालय जून 2014 से एक साथ मिलकर कार्य कर रहे है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन और भारत सरकार के 11 मंत्रालयों के बीच समझौता ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षर हुए है ताकि गंगा नदी के पुनर्जीवन और संरक्षण के क्रियाकलापों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया जा सके। 
             भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान परिषद (इसरो) के विभाग राष्ट्रीय रिमोर्ट सेंसिंग केन्द्र के साथ भी समझौता किया गया है। गंगा नदी में प्रदूषण में कमी लाने तथा स्वच्छता अभियान के लिए नीति बनाने वाले उच्च स्तरीय प्राधिकरणों ने बारीकी से निगरानी करने, अपशिष्ट का उत्पादन कम करने तथा पर्यावरण अनुकूल अपशिष्ट निष्पादन और लोगों में बिजली के श्मशान घाट की स्वीकार्यता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है। लोगो को निगरानी की रिपोर्टों से अवगत कराने की अनुशंसा की गई है।

Tuesday, 27 June 2017

पर्यटन में भारत का दुनिया में बोलबाला, हिस्सेदारी बढ़ी

      पर्यटन के क्षेत्र में विकास, पर्यटन की हिस्सेदारी को बढ़ाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रमुख एजेंडों में एक है। इसके तहत भारत सरकार ने ई टूरिस्ट वीजा का शुरुआत की, वहीं दूसरी ओर विदेशी पर्यटकों के लिए स्पेशल हेल्पलाइन से लेकर टूरिस्ट किट व मोबाइल सिम तक तमाम सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। 

     केंद्र सरकार ने नंवबर 2014 को भारत में ई टूरिस्ट वीजा की शुरुआत की थी। इसके लिए पर्यटन मंत्रालय ने गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और नागर विमानन मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया। ई टूरिस्ट वीजा योजना के शुरू में 43 देशों को ये सुविधा दी गई थी, लेकिन 2016 आते- आते यह सुविधा 150 देशों तक पहुंच चुकी हैं। जिसमें दुनिया के तमाम छोटे-बड़े देश तक सब शामिल हैं। 
         गौरतलब है कि इस समय देश के 16 महत्वपूर्ण एयरपोर्ट पर यह सुविधा काम करने लगी है। इन महत्वपूर्ण हवाई अड्डों में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरू, तिरुअनंतपुरम, गोवा, कोच्चि, वाराणसी, गया, अहमदाबाद, अमृतसर, तिरुचिरापल्ली, जयपुर और लखनऊ शामिल हैं। विदेशी पर्यटकों की आवक को लेकर की जा रही कोशिशों का असर अब दिखने लगा है। 
       आंकड़ों की बात की जाए तो देश में ई टूरिस्ट सुविधा लागू होने के बाद विदेशी पर्यटकों की आवक बढ़ी है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक ट्रैवल एंड टूरिस्ट इंडेक्स में भारत की स्थिति पहले से मजबूत हुई है। जहां यह पहले 65वें पायदान पर था, वहीं ताजा आंकड़ों के मुताबिक 12 पायदान आगे बढ़कर अब 53 पायदान पर आ गया है।
           गौरतलब है कि जनवरी से दिसंबर तक साल 2015 में जहां विदेशी पर्यटकों की तादाद 80.2 लाख रही, जबकि जनवरी से दिसंबर तक साल 2014 में यह तादाद 76.8 लाख थी। एक साल में इस आंकड़े में 4.4 फीसदी की बढोतरी देखी गई। इस साल भी इसमें भरपूर बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। साल 2016 की जनवरी में भी ट्रेंड लगातार जारी है।
         इस साल जनवरी में जहां 8.4 लाख लोग आए, वहीं जनवरी 2015 में विदेशी पर्यटकों की आवक 7.9 लाख थी। इस तादाद में तकरीबन 6.8 फीसदी का इजाफा देखा गया। विदेशी पर्यटकों की आवक का एक बडा़ असर देश की विदेशी मुद्रा की आय में बढ़ोतरी के तौर पर भी दिखा। सरकारी आंकड़ें के मुताबिक, विदेशी पर्यटकों के जरिए साल 2013 में जहां 1,07,671 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा आय हुई, वहीं साल 2014 में यह बढ़कर 1,23,320 करोड़ रुपये हुई, जबकि साल 2015 में यह राशि 1,35,193 करोड़ रुपये हो गई। 
        विदेशी पर्यटकों की आवक में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी ई टूरिस्ट वीजा के तहत हुई है। जनवरी से दिसंबर तक साल 2015 में ई टूरिस्ट वीजा पर 4,45,300 पर्यटक दिल्ली पहुंचे, वहीं दूसरी ओर इसी अवधि में साल 2014 में यह संख्या 39,046 थी। इस दृष्टि से यही बढ़ोतरी लगभग 1040 फीसदी रही। 
         साल 2016 के जनवरी-फरवरी में ई टूरिस्ट वीजा के जरिए 2,05,372 पर्यटक पहुंचे, जबकि इसी अवधि में साल 2015 में यह तादाद 50,008 थी। इस लिहाज में यह वृद्धि तकरीबन 310 फीसदी रही। साल 2015 में ई टूरिस्ट के जरिए भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों में सबसे ज्यादा तादाद यूके, अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, चीन, दक्षिण, कोरिया और चीन की रही। 
         ई टूरिस्ट वीजा के जरिए भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए भारत सरकार ने एक स्वागत पुस्तिका या वेलकम बुकलेट की सुविधा देना भी शुरू किया है, जिसमें विदेशी पर्यटकों को एयरपोर्ट पर उतरते ही एक बुकलेट दी जाती है, जिसमें पर्यटन अधिकारियों के संपर्क नबर, ईमेल आई डी जैसी तमाम जानकारी के साथ-साथ यहां ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’ की एक लिस्ट भी रहती है। इसके अलावा हेल्पलाइन नंबर की जानकारी भी होती है।
       पर्यटन मंत्रालय ने विदेशी पर्यटकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक टूरिस्ट हेल्प लाइन सेवा भी शुरू की है, जिसमें फिलाहल बारह विदेशी भाषाओं के माध्यम से जानकारी उपलब्ध है। यहां जानना रोचक होगा कि पर्यटन मंत्रालय विदेशी पर्यटकों के लिए अलग-अलग जरूरतों और रुचियों को ध्यान में रखते हुए पर्यटन की सुविधाओं और योजनाओं पर काम करना शुरू किया है; मसलन धार्मिक पर्यटन, मेडिकल पर्यटन, एडवेंचर व रोमांचक पर्यटन के अलावा, सामान्य पर्यटन तो है ही। 
          भारत कई धर्मों का एक संगम है; इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने धार्मिक पर्यटन का बढ़ावा दिया है। एनडीए सरकार द्वारा शुरू किए गए बुद्ध सर्किट, रामायण सर्किट और कृष्ण सर्किट इसी मकसद से आगे बढ़ाए जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि चीन, जापान, कोरिया, हांगकांग सहित तमाम पूर्वोतर एशियाई देशों में बड़ी तादाद में बौद्ध रह रहे हैं। इन सब देशों के लिए भारत एक बेहद सम्मानित और पावन स्थान के तौर पर देखा जाता है; इसी के मद्देनजर भारत सरकार देश में बुद्ध सर्किट को लेकर काफी गंभीरता से काम कर रही है। 
           भारत बु़द्ध सर्किट को लेकर सिर्फ देश के भीतर ही नहीं, बल्कि अपने पड़ोसी देशों मसलन, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों के साथ मिलकर भी एक ग्रेटर बुद्ध सर्किट की दिशा में आगे बढ़ने की योजना बना रही है। वहीं दूसरी ओर भारत ने मेडिकल और वेलनेस पर्यटन की दिशा में भी काफी कदम आगे बढ़ाया है। इसी के मद्देनजर पर्यटन मंत्रालय ने देश में मेडिकल एंड वेलनेस टूरिजम प्रमोशन बोर्ड बनाया है। इसका मकसद देश व दुनिया के तमाम रोगियों को भारत में बेहतरीन चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करना है। 
         उल्लेखनीय है कि भारत के मेडिकल सुविधाओं, क्वालिटी और डॉक्टरों व हॉस्पिटल्स के स्तर को देखते हुए अब पूरी दुनिया से लोग भारत इलाज के लिए आ रहे हैं। इनमें पूर्वोतर व पश्चिमी एशियाई देशों के अलावा, यूरोप व लैटिन अमेरिकी देशों के लोग शामिल हैं। दरअसल, पर्यटन से जुड़े नियोजकों का मानना है कि इलाज के लिए भारत आने वाले विदेशी अपने शिड्यूल में थोड़ा समय घूमने फिरने के लिए भी रखते हैं। 
        दूसरी ओर अब वेलनेस भी लोगों के बीच एक बड़ा ट्रेंड हो गया है। दुनिया में अब तमाम लोग योग व नेचुरल थेरेपी, स्पा आदि के जरिए अपनी सेहत को ठीक रखने पर जोर देने लगे हैं। इसे देखते हुए केरल, सहित देश के तमाम हिस्सों में नेचुरोपैथी व योग जैसी चीजों के लिए बड़ी तादाद में विदेशी भारत आ रहे हैं। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार इस क्षेत्रों को संगठित करने की कोशिश में लगी है।

Monday, 26 June 2017

भारत की कला व संस्कृति का सानिध्य संवाहक स्पिक मैके

     हैदराबाद के प्रशासनिक स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया में स्पिक मैके का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन 1986 में आयोजित हुआ जिसमें 100 से ज्यादा लोग आए। आज, हर वर्ष राष्ट्रीय सम्मेलनों में करीब 2000 लोग भाग लेते हैं, जिएमे विदेश से छात्र और स्वयंसेवक भी भाग लेते हैं। 

     गुरुकुल स्कीम को 1986 में शुरू किया गया। आज, देश भर से लगभग 100 छात्रों को लम्बे साक्षात्कार के बाद चुना जाता है और उन्हें अलग अलग गुरुओं के साथ एक माह तक रहने के लिए भेजा जाता है। 
       देश और दुनिया के कुछ जाने माने गुरु इस योजना का हिस्सा है जैसे, दलाई लामा, मदर टेरेसा की मिशनरी ऑफ चैरिटी, अरुणा रॉय, अंजॉली इला मेनन, हरिप्रसाद चौरसिया, बिरजू महाराज, कोलकाता का संगीत अनुसंधान अकादमी, मुंगेर का बिहार स्कूल ऑफ योगा आदि। इन गुरुओं से सानिध्य में रह कर यह बच्चे चिरंतन मूल्यों को ग्रहण कर पते हैं। 
           इसी प्रकार लोक कलाओं को भी सन 1986 में स्पिक मैके की गतिविधियों में शामिल किया गया। आज यह हमारी प्रोग्रामिंग का एक नियमित और अहम हिस्सा है। पहला संगीत-इन-द-पार्क भी 2002 में दिल्ली के नेहरू पार्क में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के साथ आयोजित किया गया था। अब एक वार्षिक कार्यक्रम बन गया है जो तीन शहरो में आयोजित हो रहा है। 
          इसके अंतर्गत देश के वरिष्ठ से वरिष्ठ कलाकार एक पार्क में जन जन के लिए कार्यक्रम करते हैं। सभी कार्यक्रमों की तरह यह भी निशुल्क होता है। वर्ष 2004 में स्पिक मैके ने कार्यशालाएं शुरू कीं और 2012 में राजस्थान के कोटा अध्याय में वर्कशॉप-डेमोस्ट्रेशन (डब्लूडीएस) का आरम्भ हुआ। यह प्रोग्राम विशेषकर नगर निगम और ग्राम विद्यालयों के छात्रों को ध्यान में रख कर बनाया गया था।
            इसमें एक कलाकार 45 मिनट तक छात्रों को अपनी कला के बारे में बताता है और फिर अगले 45 मिनट पूर्व-दर्ज संगीत के साथ उसी कला का प्रदर्शन करता है। एक सप्ताह तक प्रति दिन इसी प्रकार कार्यशाला चलती है और अंत में सब बच्चो से पुछा जाता है की उन्होंने क्या सीखा।
         स्पिक मैके की शुरुआत 1977 में आईआईटी, दिल्ली में हुई जिससे छात्रों को कम उम्र में ही भारत की कला व संस्कृति से परिचित कराया जा सके क्योंकि उस समय उनका मन और मस्तिष्‍क अधिक ग्रहणशील होता है।
           स्किक मैके का मकसद, छात्रों को देश के सर्वश्रेष्ठ कलाकारों के सीधे संपर्क में लाना और उन्हें भारतीय विरासत के विभिन्न पहलुओं के बारे में अवगत कराते हुए प्रेरणा देना और फिर इंतज़ार होता की कब कलाकारों और कला के जादू से इन छात्रों के मन में कला के प्रति अनुराग और दिलचस्पी उजागर हो। 
          स्पिक मैके ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कथक के कार्यक्रमों से अपनी शुरूआत की थी, पर जल्द ही इसमें कर्नाटक शास्त्रीय संगीत, सभी आठ प्रकार के शास्त्रीय नृत्य, लोक संगीत और नृत्य की विभिन्न शैलियाँ, योग और ध्यान, देश के विभिन्न राज्यों के शिल्प और बुनाई की शैलियाँ, समग्र खाद्य परंपराए, क्लासिक सिनेमा, चित्रकला, सामाजिक कार्य, दर्शन, धर्मशास्त्र, आदि विभिन्न विषयों पर प्रसिद्ध विशेषज्ञों द्वारा वार्ता इत्यादि गतिविधियाँ भी शामिल कर ली गयीं। 
          इन समस्त गतिविधियों के द्वारा हमारा प्रयास यही रहा है की युवाओं को एक अमूर्त या अस्पृश्य ज्ञान क्षेत्र की ओर ले जा सके. उन्हें उनके अंतरमन में बसे सत्य, रौंगटे खड़े कर देने वाले या आँखों से बरबस नीर बह निकलने वाले अनुभव अथवा 'मैं नहीं जानता कि वह क्या था, पर जो भी था अद्भुत था’ जैसी भावना के साथ फिर से जोड़ना ही हमारा असली ध्येय है। 
         जब स्पिक मैके शुरू हुआ तब कई प्रतिष्ठित कलाकारों से उनके कार्यक्रम के लिए नाम मात्र मानदेय की पेशकश पर समर्थन के लिए अनुरोध करना पड़ता था। आज, कलाकार स्वयं स्पिक मैके के कार्यक्रमों में स्‍वेच्‍छा से भाग लेते हैं। 1980 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम (1860) के तहत पंजीकृत करने के पश्चात्, 1981 में इस आन्दोलन ने अपने पंख पसारने शुरू किये और जल्द ही अहमदाबाद, मुंबई, कलकत्ता, खड़गपुर, हैदराबाद (1984), बैंगलोर (1985) तक पहुंच गया। 
         जैसे जैसे आन्दोलन के स्वयंसेवक और छात्र विदेशों में पढने या बसने के लिए जाते रहे, वे अक्सर उस देश में स्पिक मैके अध्याय शुरू करने की इच्छा व्यक्त करते और इस प्रकार आज यह आन्दोलन अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, हांगकांग, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फिलीपींस, बांग्लादेश, श्रीलंका, फ्रांस और नॉर्वे तक फैल चुका है। पिछले 40 वर्षों में, स्पिक मैके में परिवर्तन निरंतरता से चला आ रहा है क्योंकि हम नियमित रूप से नए कलाकार और कलाए, नए संस्थान, नए कस्बे, देश व् स्वयंसेवको को जोड़ते रहे हैं।
           फिबोनैची स्पाइरल की तरह, स्पिक मैके भी कभी न समाप्त होने वाली एक घुमावदार कुंडली है जहाँ खुलापन है, समग्रता है, विस्तार है, सह-अस्तित्व की भावना व्याप्त है, एकत्रीकरण-वृद्धिशील बढ़त है। आज एक वर्ष में 5000 से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन भारत और विदेशों में, 817 स्थानों पर और 2000 से अधिक शैक्षिक संस्थान में किया जाता है, जिससे लगभग 30 लाख छात्रों को प्रभावित कर पाते हैं। 
           पहला ग्रामीण स्कूल इन्टेनसिवे (कार्यशाला) सितंबर 2011 में आयोजित किया गया था, जहां 150 से अधिक छात्र 6 दिवसीय सम्मलेन के लिए आए थे। ये कार्यशाला उन बच्चों से लिए था जो बहुत देश के पिछड़े इलाको में रहते थे। यही कुछ छात्र ऐसे थे जिन्होंने कभी अपने गांव से बाहर कदम नहीं रखा था, कुछ लोग कभी भी ट्रेन में नहीं बैठे थे, कुछ लोगों को कभी एक दिन में तीन समय का भोजन नहीं मिला था, और कुछ तो केवल दो कपड़े पहनते थे..इस कार्यशाला का एक एक कार्यक्रम इन सब ग्रामीण बच्चों ने बड़े प्यार और धन से देखा और आत्मसात किया. इससे स्वयंसेवकों को भी नया परिप्रेक्ष्य मिला है. आज, हैदराबाद, अनंतपुर, विशाखापत्तनम, बेंगलुरु, धारवाड़, गुलबर्गा, बिहार, गोवा, यूपी में 15 से अधिक ग्रामीण स्कूल इन्टेनसिवे का आयोजन किया जा चुका है। 
          स्पिक मैके में नियमित साप्ताहिक बैठकों में प्रबंध होता है जो आयोजन की लोकतांत्रिक शैली के मुख्य भाग में होते हैं, जहां अक्सर वार्ता के माध्यम से निर्णय लिया जाता है, शामिल करने, चर्चा, विश्लेषण, विस्तार, विकास के लिए जगह हमेशा रहती है। इस लोक आंदोलन में स्वंयसेवको का भी अभिन्न योगदान है जो विभिन्न गतिविधियो में वर्षो से बिना किसी वेतन के सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

Sunday, 25 June 2017

भारत बिजली के आयातक से बदलकर बिजली निर्यातक बना

          भारत ने विद्युत क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई है। सुधारों की विश्‍व भर में चर्चा हो रही है। बिजली पहुंच में 2014 में भारत का विश्‍व में 99 स्‍थान था। अब भारत 26 वें स्‍थान पर पहुंच गया है। 

      देश के लिए गर्व है कि 3000-4000 मेगावाट अतिरिक्‍त बिजली राज्‍यों को और वितरण कंपनियों को रियल टाइम पर उपलब्‍ध है और पॉवर एक्‍सचेंज में बिजली रियायती दर पर उपलब्‍ध है। तीन वर्षों के अंदर भारत की कुल बिजली क्षमता लगभग एक तिहाही (31 प्रतिशत या 76,577 मेगावाट अतिरिक्‍त) बढ़ी है। बिजली क्षमता 2014 के 243 गीगावाट से बढ़कर मार्च 2017 में 320 गीगावाट हो गई और परम्‍परागत या कोयला आधारित बिजली क्षमता (जो देश की समग्र बिजली क्षमता का प्रमुख आधार है) बिजली क्षमता एक चौथाई यानी 26 प्रतिशत अर्थात् मार्च 2014 के 214 गीगावाट से बढ़कर मार्च 2017 में 270 गीगावाट हो गई। 2014 में ऊर्जा अभाव 42,428 मिलियन यूनिट (4.2 प्रतिशत) की थी, जो 2017 में कम होकर 7,459 मिलियन यूनिट (0.7 प्रतिशत) हो गयी। 
           इसी तरह 2014 में शीर्ष ऊर्जा अभाव 6,103 मिलियन यूनिट (4.5 प्रतिशत) थी, जो 2017 में कम होकर 2,608 मिलियन यूनिट (1.6 प्रतिशत) रह गयी। पिछले तीन वर्षों में यानी 2014-2017 में बिजली उत्‍पादन में 6.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2014-16 में बिजली उत्‍पादन में 6.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और यदि हम ऊर्जा सक्षमता गतिविधियों के कारण टाले गये उत्‍पादन को जोड़े तो यह वृद्धि 9.5 प्रतिशत की होगी।
        महत्‍वपूर्ण है कि भारत बिजली के कुल आयातक से बदलकर बिजली निर्यातक बन गया है। भारत ने 2017 में नेपाल-बांग्‍लादेश और म्‍यामांर को 5,798 मिलियन यूनिट बिजली का निर्यात किया। विद्युत क्षेत्र में परिवर्तन केवल विद्युत उत्‍पादन से नहीं होता। बिजली ट्रांसमिशन क्षेत्र में भी उचित कदम उठाये गये। इसके परिणाम स्‍वरूप पिछले तीन वर्षों में शानदार वृद्धि दिखी। 
          सरकार के ‘एक देश, एक मूल्‍य और एक ग्रिड’ पहल के अनुरूप ट्रांसमिशन क्षेत्र में 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मार्च 2014 में ट्रांसमिशन क्षमता 5,30,546 एमवीए से बढ़कर मार्च 2017 में 7,22,949 एमवीए हो गई। इसके साथ ही ट्रांसमिशन लाइनों में 26 प्रतिशत वृद्धि हुई। मार्च 2014 में ट्रांसमिशन लाइनें 2,91,336 सर्किट किलोमीटर थी, जो बढ़कर मार्च 2017 में 3,66,634 सीकेएम हो गई। 
        दक्षिण भारत को विकल्‍प अंतरण क्षमता में 87 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह क्षमता मार्च 2014 के 3,450 मेगावाट से बढ़कर मार्च 2017 में 6,450 हो गई। देश के सभी गांवों में बिजली देने के मोदी सरकार के कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में साथ-साथ किये गये सुधारों से भी विद्युत क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन संभव हुआ। बिजली से वंचित गांवों को जोड़ने और ग्रामीण लोगों की जिन्‍दगी में परिवर्तन लाने के लिए 2014 में दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) के अंतर्गत ग्रामीण बिजलीकरण कार्यक्रम की घोषणा की गई। 2014 में बिजली से वंचित गांवों की संख्‍या 18,452 थी। सरकार के सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत विशेष फोकस के साथ चलाये गये इस कार्यक्रम से 12 मई, 2017 तक 18,441 गांवों में से 13,123 से अधिक गांवों में बिजली कनेक्‍शन प्रदान करके नई उपलब्धि हासिल की गई। 
            प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने लालकिले के प्राचीर से 15 अगस्‍त, 2015 को देश को संबोधित करते हुए यह वायदा किया था कि 1000 दिनों के अंदर शेष 18,452 गांवों का बिजलीकरण कर दिया जाएगा। सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्‍य के अंतर्गत मई 2018 तक सभी गांवों का बिजलीकरण कर दिया जाएगा, लेकिन गतिशील विद्युत, कोयला, नवीकरणीय ऊर्जा तथा खान मंत्री पीयूष गोयल ने इस लक्ष्‍य की अवधि को कम कर दिया है और वह चाहते है कि दिसम्‍बर 2017 तक सभी गांवों का बिजलीकरण हो जाए।
            यह अपने आप में कीर्तिमान होगा। ऊर्जा क्षमता अभियान के अंतर्गत सरकार की ओर से लगभग 23 करोड़ एलईडी बल्‍ब बांटे गये और निजी कंपनियों ने 33 करोड़ एलईडी बल्‍ब बांटे। इस कदम से उपभोक्‍ताओं के बिजली बिलों में प्रतिवर्ष 20,000 करोड़ रूपये की बचत हुई।

Friday, 23 June 2017

दुनिया का इतिहास बनेगा जम्मू-कश्मीर की चेनाब नदी का पुल

        जम्मू-कश्मीर में शिवालिक की ऊंची पहाड़ियों के बीच बहने वाली चेनाब नदी पर भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे ऊंचा रेल पुल बना रहा है।

         भारतीय रेलवे जल्द ही दुनिया में एक नया इतिहास रचने जा रहा है। यह रेल पुल दुनिया में अपने वास्तु और अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर फ्रांस की राजधानी पेरिस में बने एफिल टॉवर से भी 35 मीटर ऊंचा होगा। यह पुल दिल्ली के कुतुबमीनार से करीब 5 गुना ऊंचा होगा। रेलवे के मुताबिक चेनाब नदी पर बन रहे इस पुल की ऊंचाई 359 मीटर होगी। यह पुल 1315 मीटर लंबा होगा। इसकी चौड़ाई 13.5 मीटर होगी। इस बेजोड़ पुल को बनाने में 25 हजार मीट्रिक टन स्टील का इस्तेमाल होगा।
          रेलवे के तमाम अफसर और सैकड़ों मजदूर दिन-रात इस पुल को बनाने में जुटे हैं। फिलहाल इस पुल का काम 70 फीसदी पूरा हो चुका है। उम्मीद जताई जा रही है कि दिसंबर 2018 तक यह पुल पूरी तरह बन कर तैयार हो जाएगा। इस पुल को बनाने में करीब 1198 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
            शिवालिक की पहाड़ियों के बीच बन रहे इस पुल की ऊंचाई, इसकी डिजाइन और इसे बनाने में इस्तेमाल इंजीनियरिंग को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि तैयार होने के बाद ये पुल इंसानी कारीगरी का नायाब नमूना होगा, जिसकी मिसाल सदियों तक दुनिया भर में दी जाएगी।
           चेनाब नदी पर बन रहा ये पुल उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला रेल लिंक परियोजना का सबसे अहम हिस्सा है। यह पुल जम्मू को श्रीनगर से जोड़ेगा। इस लिहाज से इस पुल की अहमियत बहुत ज्यादा है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामुला रेल लिंक परियोजना को चार भागों में बांटा गया है।
           पहला है उधमपुर से कटरा तक का रेल रूट, जो 25 किलोमीटर लंबा है। जुलाई 2014 में ये रेल रूट पूरा हो चुका है और इस पर ट्रेनों की आवाजाही शुरू हो चुकी है। दूसरा है कटरा से बनिहाल का रेलवे रूट, जो कि 111 किलोमीटर लंबा होगा। चेनाब नदी पर बन रहा सबसे ऊंचा पुल इसी रूट का हिस्सा है। रेलवे के मुताबिक यह रूट 2021 तक पूरी तरह तैयार हो जाएगा।
            तीसरा है बनिहाल से काजीगुंड का 18 किलोमीटर लंबा रास्ता जो कि जून 2013 में बनकर तैयार हो चुका है और इस रुट पर भी ट्रेन दौड़ने लगी है। चौथा है काजीगुंड से बारामुला का 118 किलोमीटर का हिस्सा। ये रूट भी 2009 में पूरा हो चुका है। 
         चेनाब पर बन रहे इस पुल का निर्माण भारतीय रेलवे की एक इकाई कोंकण रेल कॉर्पोरेशन कर रहा है। स्टील से बन रहे इस पुल की डिजाइनिंग और निर्माण के लिए दुनिया के बेहतरीन पुल विशेषज्ञों से सलाह-मशवरा किया गया। उनकी मदद ली गई। चेनाब नदी का ये इलाका दुर्गम पहाडियों के बीच का है। आड़ी-तिरछी पहाड़ियों के बीच पुल का निर्माण हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। 
          कश्मीर घाटी के मौसम ने भी इस पुल के निर्माण में कम चुनौतियां नहीं खड़ी कीं। बर्फबारी और सर्द हवाओं ने इस पुल को बनाने में जुटे अफसरों और मजदूरों के लिए काफी कठिन परिस्‍थितियां उत्‍पन्‍न कीं। यही वजह है कि इस पुल को बनाने के लिए भारतीय रेलवे को फिनलैंड, जर्मनी और डेनमार्क जैसे देशों के पुल निर्माण विशेषज्ञों की मदद लेनी पड़ी। पूरे इलाके के गहन सर्वे और जानकारों से सलाह-मशवरे के बाद इस पुल का अंतिम डिजाइन तैयार हुआ। 
           चेनाब पुल को कुछ इस तरह से डिजाइन किया गया है कि 266 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बहने वाली तेज हवाएं भी इसका बाल तक बांका नहीं कर सकेंगी। पुल में हवा की तेज गति को भांपने वाले सेंसर भी लगे हैं, जो किसी भी आपात स्थिति में खुद-ब-खुद ट्रेन का परिचालन बंद कर देंगे। शून्य से 20 डिग्री कम तापमान हो या तपती गर्मी में 45 डिग्री तक का तापमान, इस पुल में लगे स्टील को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते।
           इतना ही नहीं पुल को बनाते वक्त भूकंप के खतरे को भी ध्यान में रखा गया। भूकंप आने के लिहाज से देश को पांच हिस्सों में बांटा गया है और चेनाब नदी का ये इलाका भूंकप आने के लिहाज से सीस्मिक जोन-4 में आता है। लेकिन इस रेल पुल को बनाने के लिए सीस्मिक जोन-5 के आधार पर टेस्ट किए गए हैं। मतलब ये कि अगर रिक्टर पैमाने पर 8 की तीव्रता का भूकंप आया तो इस पुल को कोई नुकसान नहीं होगा।
               सबसे खास बात ये कि इस पुल की पुताई के लिए जिस पेंट का इस्तेमाल किया गया है वो कोई साधारण पेंट नहीं है। रेलवे के मुताबिक इस पेंट की औसत उम्र 15 से 20 साल है। इस पेंट पर धूप, बारिश और बर्फ का असर नहीं के बराबर होता है। 
        कश्मीर में बन रहा ये बेमिसाल पुल जम्मू और श्रीनगर को जोड़ेगा। ऐसे में इस पुल की अहमियत बहुत ज्यादा होगी, लिहाजा ये रेल पुल आंतकियों के निशाने पर भी हो सकता है। इस खतरे को ध्यान में रखते हुए रेलवे ने इस पुल को ब्लास्ट प्रूफ बनाया है। रेलवे का दावा है कि इस पुल पर 40 टन विस्फोटक के दबाव से हमला किया जाए तो भी इसको कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। 
            रेलवे अपने इस पुल की उम्र 120 साल बता रहा है, लेकिन अगर इसका रखरखाव सही से किया गया तो ये पुल 120 साल से भी अधिक कार्य करेगा। रेलवे के इस पुल के बन जाने से जम्मू-कश्मीर देश के बाकी हिस्सों से हर मौसम में 12 महीने जुड़ा रह पाएगा, क्योंकि सर्दियों में भारी बर्फबारी की वजह से अक्सर सड़क मार्ग बंद हो जाता है और श्रीनगर समेत कश्मीर के कई इलाके देश से कट जाते हैं। 
            साथ ही चेनाब पुल के बनने के बाद जम्मू से श्रीनगर आने-जाने में 4 से 5 घंटे का वक्त कम लगेगा। ऐसे में इस पुल के बन जाने से कश्मीर के पर्यटन को तो बढ़ावा मिलेगा ही, वहां रह रहे लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधरेगी। 
            रेलवे ने इस परियोजना के लिए जिन लोगों की जमीन 75 फीसदी से ज्यादा अधिग्रहीत की है, उनके परिवार में एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी गई है। इतना ही नहीं परियोजना में काम करने वाले लोगों को चेनाब तक पहुंचाने के लिए रेलवे ने 200 किलोमीटर लंबी सड़क भी तैयार की है, जो कि इस रेल लाइन के शुरू होने के बाद स्थानीय लोगों के आने-जाने के काम भी आएगी।

Thursday, 8 June 2017

जलाशयों से 60 मेगावाट पनबिजली

           देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 35.622 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 123 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 104 प्रतिशत है। 11 मई को समाप्त हुए सप्ताह के अंत में यह 24 प्रतिशत थी। 

       इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं।

                  उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.25 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 24 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 21 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 28 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है, लेकिन पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से यह कमतर है। 

               पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 5.88 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 31 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 25 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 20 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

            पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 7.19 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 15 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 27 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण के बराबर है। 

            मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 14.27 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 34 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 26 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 21 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।

             दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.04 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 8 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 11 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 18 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है, और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है।

             पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना शामिल हैं। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बराबर है, उनमें एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं) शामिल हैं। इसी अवधि के लिए पिछले साल की तुलना में कम संग्रहण करने वाले राज्यों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं।

बनारस सिल्क को रेशमी वस्त्र एवं अन्य उत्पाद श्रेणी में प्रथम पुरस्कार मिला    वाराणसी. राज्य निर्यात पुरस्कार योजना वर्ष 2017-18 के अंतर...