भारत बिजली के आयातक से बदलकर बिजली निर्यातक बना
भारत ने विद्युत क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई है। सुधारों की विश्व भर में चर्चा हो रही है। बिजली पहुंच में 2014 में भारत का विश्व में 99 स्थान था। अब भारत 26 वें स्थान पर पहुंच गया है।
देश के लिए गर्व है कि 3000-4000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली राज्यों को और वितरण कंपनियों को रियल टाइम पर उपलब्ध है और पॉवर एक्सचेंज में बिजली रियायती दर पर उपलब्ध है। तीन वर्षों के अंदर भारत की कुल बिजली क्षमता लगभग एक तिहाही (31 प्रतिशत या 76,577 मेगावाट अतिरिक्त) बढ़ी है। बिजली क्षमता 2014 के 243 गीगावाट से बढ़कर मार्च 2017 में 320 गीगावाट हो गई और परम्परागत या कोयला आधारित बिजली क्षमता (जो देश की समग्र बिजली क्षमता का प्रमुख आधार है) बिजली क्षमता एक चौथाई यानी 26 प्रतिशत अर्थात् मार्च 2014 के 214 गीगावाट से बढ़कर मार्च 2017 में 270 गीगावाट हो गई। 2014 में ऊर्जा अभाव 42,428 मिलियन यूनिट (4.2 प्रतिशत) की थी, जो 2017 में कम होकर 7,459 मिलियन यूनिट (0.7 प्रतिशत) हो गयी।
इसी तरह 2014 में शीर्ष ऊर्जा अभाव 6,103 मिलियन यूनिट (4.5 प्रतिशत) थी, जो 2017 में कम होकर 2,608 मिलियन यूनिट (1.6 प्रतिशत) रह गयी। पिछले तीन वर्षों में यानी 2014-2017 में बिजली उत्पादन में 6.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2014-16 में बिजली उत्पादन में 6.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और यदि हम ऊर्जा सक्षमता गतिविधियों के कारण टाले गये उत्पादन को जोड़े तो यह वृद्धि 9.5 प्रतिशत की होगी।
महत्वपूर्ण है कि भारत बिजली के कुल आयातक से बदलकर बिजली निर्यातक बन गया है। भारत ने 2017 में नेपाल-बांग्लादेश और म्यामांर को 5,798 मिलियन यूनिट बिजली का निर्यात किया। विद्युत क्षेत्र में परिवर्तन केवल विद्युत उत्पादन से नहीं होता। बिजली ट्रांसमिशन क्षेत्र में भी उचित कदम उठाये गये। इसके परिणाम स्वरूप पिछले तीन वर्षों में शानदार वृद्धि दिखी।
सरकार के ‘एक देश, एक मूल्य और एक ग्रिड’ पहल के अनुरूप ट्रांसमिशन क्षेत्र में 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मार्च 2014 में ट्रांसमिशन क्षमता 5,30,546 एमवीए से बढ़कर मार्च 2017 में 7,22,949 एमवीए हो गई। इसके साथ ही ट्रांसमिशन लाइनों में 26 प्रतिशत वृद्धि हुई। मार्च 2014 में ट्रांसमिशन लाइनें 2,91,336 सर्किट किलोमीटर थी, जो बढ़कर मार्च 2017 में 3,66,634 सीकेएम हो गई।
दक्षिण भारत को विकल्प अंतरण क्षमता में 87 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह क्षमता मार्च 2014 के 3,450 मेगावाट से बढ़कर मार्च 2017 में 6,450 हो गई। देश के सभी गांवों में बिजली देने के मोदी सरकार के कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में साथ-साथ किये गये सुधारों से भी विद्युत क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन संभव हुआ। बिजली से वंचित गांवों को जोड़ने और ग्रामीण लोगों की जिन्दगी में परिवर्तन लाने के लिए 2014 में दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) के अंतर्गत ग्रामीण बिजलीकरण कार्यक्रम की घोषणा की गई। 2014 में बिजली से वंचित गांवों की संख्या 18,452 थी। सरकार के सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत विशेष फोकस के साथ चलाये गये इस कार्यक्रम से 12 मई, 2017 तक 18,441 गांवों में से 13,123 से अधिक गांवों में बिजली कनेक्शन प्रदान करके नई उपलब्धि हासिल की गई।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले के प्राचीर से 15 अगस्त, 2015 को देश को संबोधित करते हुए यह वायदा किया था कि 1000 दिनों के अंदर शेष 18,452 गांवों का बिजलीकरण कर दिया जाएगा। सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य के अंतर्गत मई 2018 तक सभी गांवों का बिजलीकरण कर दिया जाएगा, लेकिन गतिशील विद्युत, कोयला, नवीकरणीय ऊर्जा तथा खान मंत्री पीयूष गोयल ने इस लक्ष्य की अवधि को कम कर दिया है और वह चाहते है कि दिसम्बर 2017 तक सभी गांवों का बिजलीकरण हो जाए।
यह अपने आप में कीर्तिमान होगा। ऊर्जा क्षमता अभियान के अंतर्गत सरकार की ओर से लगभग 23 करोड़ एलईडी बल्ब बांटे गये और निजी कंपनियों ने 33 करोड़ एलईडी बल्ब बांटे। इस कदम से उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में प्रतिवर्ष 20,000 करोड़ रूपये की बचत हुई।

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