Friday, 25 August 2017

सुरक्षा से खिलवाड़ न हो

        भोजन-पानी, घर-घरौंदा,कपड़ा लत्ता की आवश्यकतायें पूरी होने के साथ ही सुरक्षा अहम है। सुरक्षा चाहे देश की हो या समाज या फिर व्यक्ति की हो, खास मायने रखती है। 

    सुरक्षा को लेकर देश-दुनिया में कानून भी हैं लेकिन कानून के साथ-साथ सुरक्षा को लेकर खुद भी सावधान-सतर्क रहना चाहिए क्योंकि हर जगह-स्थान पर कानून साथ खड़ा नहीं रहता। खुद सावधान-सतर्क रहेंगे तो कहीं अधिक सुरक्षित रहेंगे। अब देखें तो देश में आैसत हर घंटे सड़क हादसों में चौदह-पन्द्रह व्यक्तियों की मौत हो जाती है। 
     ऐसा नहीं कि इन आप्राकृतिक घटनाओं-दुर्घटनाओं को रोका नहीं जा सकता लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि शासकीय सेवाओं-व्यवस्थाओं के साथ-साथ खुद भी सावधान-सतर्क रहें। हालांकि समय के साथ मोटर कानून में भी बदलाव-संशोधन होना चाहिए क्योंकि सख्त एवं व्यवहारिक कानून न होने से उसे क्रियान्वित या लागू करने में दिक्कतें होती है। जिससे समाज या व्यक्ति को सीधा लाभ-फायदा नहीं मिल पाता। 
    अब देखें तो पायेंगे कि मोटर व्हीकल एक्ट अभी भी बाबा-आदम जमाने अर्थात ब्रिटिशकालीन चला रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो सड़क हादसों में मामूली जुर्माना होकर घटना-दुर्घटना का मामला रफा-दफा हो जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो सालाना करीब पांच लाख व्यक्तियों की मौत विभिन्न कारणों से हो जाती है। इनमें दो लाख व्यक्तियों की मौत केवल सड़क हादसों से होती है। 
       इससे व्यक्ति की जान की क्षति तो होती ही है, माल की भी क्षति होती है। सड़क हादसों से दो लाख करोड़ धनराशि की आर्थिक क्षति होती है। जान-माल की इस क्षति को रोका जा सकता है।कम से कम न्यूनतम तो किया ही जा सकता है। हालांकि सड़क परिवहन एवं सुरक्षा विधेयक-2014 लाने की कोशिश चल रही है। सड़क हादसों को रोकने व न्यूनतम करने के लिए आवश्यक है कि सख्त व व्यवहारिक कानून हो, जनता जागरुक हो तो वहीं सड़क नेटवर्क बेहतर डिजाइन का हो।
      सड़क नेटवर्क बेहतर होना चाहिए क्योंकि सड़क नेटवर्क में अपेक्षित विस्तार न होने या वृद्धि न होने से वाहन चालकों के सामने दिक्कतें आती हैं। सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण सड़क नेटवर्क का बेहतर न होना भी है तो वहीं सड़कों का डिजाइन भी दुर्घटनाओं के लिए कम जिम्मेदार नहीं। खुद को भी दुर्घटनाओं से बचने के लिए सचेष्ट रहना चाहिये क्योंकि कई बार छोटा सा कारण भी दुर्घटना का कारण बन जाता है। कर्तव्य निवर्हन पर ध्यान देंगे तो काफी कुछ सुधरा दिखेगा क्योंकि कर्तव्य निवर्हन से व्यवस्थायें सुचारु हो जाती हैं।
    कर्तव्य निवर्हन से अधिकार खुद-ब-खुद हासिल हो जाते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो वाहन की यांत्रिक स्थिति ठीक न होने के कारण तीन प्रतिशत दुर्घटनायें होती हैं। खराब सड़क के कारण बारह प्रतिशत दुर्घटनायें होती हैं। इसी तरह से चालक की गलती-लापरवाही से सत्तर प्रतिशत दुर्घटनायें होती हैं। खराब मौसम के कारण सात प्रतिशत दुर्घटनायें होती हैं।
      देश में सड़कों का संजाल करीब चौंतीस लाख किलोमीटर लम्बा है जबकि वाहनों की संख्या साढ़े नौ करोड़ है। आजादी के समय देश में सड़कों की लम्बाई 3.98 हजार किलोमीटर थी जबकि वाहनों की संख्या तीन लाख थी। अब देखें तो सड़कों पर वाहनों का दबाव काफी बढ़ा लेकिन सड़क नेटवर्क में उस रफ्तार से सुधार-बदलाव नहीं हो सका।
      इस पर स्थानीय निकायों से लेकर केन्द्रीय शासन-सत्ता में बैठे नीति-नियंताओं को गम्भीरता से विचार-विमर्श करना चाहिए क्योंकि यह जान एवं माल की सुरक्षा से ताल्लुक रखने वाला गम्भीर विषय है क्योंकि क्षति तो क्षति होती है। अब क्षति चाहे व्यक्ति की हो या फिर आर्थिक हो लेकिन व्यक्ति की क्षति कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि व्यक्ति की क्षति की पूर्ति करना असंभव व नामुमकिन होता है। व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारियां-उत्तरदायित्व व कर्तव्य सहित बहुत कुछ उसमें निहीत होता है।

                     

Thursday, 24 August 2017

प्रदूषण नियंत्रण नहीं आसान, बनें सख्त कानून

         कूड़ा कचरा को अब कूड़ा नहीं समझना चाहिए। जी हां, कूड़ा कचरा का अपेक्षित व वैज्ञानिक उपयोग सुनिश्चित हो जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी कि कूड़ा कचरा राष्ट्रीय आय के एक बड़े संसाधन के तौर पर विकसित हो जाये।

     भाभा रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक डा. एस.पी. काले की मानें तो देश में कूड़ा प्रबंधन के क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध व तकनीकि अपनाने की आवश्यकता है। कूड़ा प्रबंधन में वैज्ञानिक शोध व अत्याधुनिक तौर तरीके अपनाये गये। जिससे बेहद अच्छे, सार्थक व उपयोगी परिणाम सामने आये हैं। चेन्नई, मुम्बई व पूणे आदि शहरों में वैज्ञानिक तौर तरीकों ने कूड़ा प्रबंधन की दशा व दिशा ही बदल दी। 
       शोधकर्ताओं व वैज्ञानिकों की मानें तो अब कूड़ा कचरा नहीं रहा बल्कि उसने एक सम्पत्ति या एसेस्ट्स का रूप ले लिया। एक टन कचरा से काफी तादाद में मिथेन गैस उपलब्ध हो जाती है। आंकलन है कि देश में एक लाख टन कचरा नित्य निकलता है। अब इस कूड़ा कचरा का सही एवं अपेक्षित वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाये तो आसानी से रोजाना दो लाख गैस सिलेण्डर तैयार किये जा सकते हैं। 
     इससे एक तो गैस उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी तो वहीं कूड़ा कचरा निस्तारण-प्रबंधन की अत्याधुनिक तौर तरीकों को बल मिलेगा। ऐसा नहीं है कि देश में कूड़ा प्रबंधन को लेकर वैज्ञानिक शोध नहीं हो रहे हैं लेकिन इन शोध को प्रयोगशालाओं से निकाल कर मूर्तरूप में लाना होगा या व्यवहारिक धरातल पर अमल करना होगा। भाभा रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक डा. काले की मानें तो शोध के उपरांत एक खास बकेट (विशेष टोकरी) विकसित की गयी है।
      इस टोकरी की खासियत है कि कचरा खुद ब खुद खाद में तब्दील हो जाता है। इस टोकरी का उपयोग घरेलू कूड़ा कचरा के निस्तारण में आसानी से किया जा सकता है। घरेलू कचरा इस खास टोकरी में एकत्र करते जायें। इसमें खाद्य सामग्री का कचरा खास तौर से फल, सब्जियां, छीलन व किचन का कचरा एकत्र किया जा सकता है। टोकरी में पडे़ इस कचरा से न तो कोई बदबू-सडांध आयेगी आैर न किसी प्रकार का कोई संक्रमण ही फैलेगा। 
      इतना ही नहीं न तो कोई लार्वा बनेगा आैर न कचरा पर मक्खियां ही दिखेंगी। एक से दो सप्ताह में यह कचरा स्वत: खाद में तब्दील हो जायेगा। इस कचरा का उपयोग घरेलू या सार्वजनिक बाग-बगीचा में किया जा सकता है। इसी प्रकार ठोस कूड़ा, इलेक्ट्रानिक कूड़ा, जैव चिकित्सा कूड़ा, प्लास्टिक कूड़ा कचरा का निस्तारण किया जा सकता है।
       भले ही इनमें से कतिपय प्रकार के कूड़ा कचरा के निस्तारण से कोई लाभ न हो लेकिन इतना तो अवश्य होगा कि खतरनाक कूड़ा का अपेक्षित निस्तारण तो हो जायेगा। प्रदूषण चाहे कूड़ा कचरा जनित हो या फिर अन्य किसी भी प्रकार का प्रदूषण हो, पर्यावरण से लेकर इंसान तक सभी के लिए खतरनाक व संक्रमण का कारक है। 
     विशेषज्ञों की मानें तो यह प्रदूषण कैंसर, एलर्जी, अस्थमा सहित अनेक प्रकार की व्याधियां देता है तो वहीं शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कमजोर करता है। हालांकि ऐसा नहीं कि केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकारें चिंतित नहीं हैं लेकिन अभी तक कहीं कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आये।
      करीब एक से डेढ़ दशक पहले केन्द्र सरकार ने जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन के तहत देश भर के नगर निकायों को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की परियोजनायें दी थी। हालात यह रहे कि इन अधिसंख्य नगर निकायों में अभी तक परियोजनायें अपेक्षित आकार नहीं ले सकीं। उद्योग उत्पादित प्रदूषण भी कम खतरनाक नहीं होता।
      उद्योग उत्पादित प्रदूषण में कार्बनडाई आक्साइड धरती व पर्यावरण सहित चौतरफा प्रदूषण फैलाता है। रसायनिक उद्योग, तेल रिफायनरीज, आणविक अपशिष्ठ स्थल, कूड़ाघर, प्लास्टिक-पॉलीथिन उद्योग, कार-मोटर साइकिल उद्योग, पशुवधशाला आदि गम्भीर व खतरनाक प्रदूषण पैदा करते हैं। इन कल-कारखानों से हाईड्रोकार्बन, भारी तत्व में लेड, कैडमियम, क्रोमियम, जिंक, आर्सेनिक, बैनजीन आदि प्रदूषण तत्व होते हैं। ऐसा नहीं कि देश में प्रदूषण पर अंकुश या नियंत्रण के लिए कानून नहीं हैं।
       केन्द्र की सत्ता में आने वाली करीब-करीब हर सरकार कानून बनाती है। बात तो तब है, जब कानून बनें आैर सख्ती के साथ लागू भी हों क्योंकि तभी कानून की सार्थकता है। कानून का लाभ देश की आम आवाम को मिलना चाहिए क्योंकि तभी कानून की सार्थकता है। हालांकि केन्द्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने देश के दो हजार उद्योगों को नोटिस जारी किया है। 
    नोटिस का मंतव्य है कि उद्योग संचालक स्थल पर ऐसे संयंत्र लगायें जिससे प्रदूषण के स्तर को मापा जा सके। अब मंत्रालय की मानें तो एक हजार उद्योग संचालकों ने संयंत्र लगा भी लिये। मंत्रालय के लिए नोटिस जारी करना ही पर्याप्त न होगा। नोटिस पर अमल भी होना चाहिए क्योंकि मंत्रालय की रीतियां-नीतियां अमल में आयेंगी तो कहीं न कहीं प्रदूषण नियंत्रण का प्रभाव दिखेगा। 
     हालात यह हैं कि देश खास तौर से देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण कहीं अधिक या यूं कहें कि प्रदूषण खतरनाक व गम्भीरतम स्थान तक पहंुच चुका है। हालांकि भारत सरकार देश के बाशिंदों को भरोसा दिलाती है कि सरकार शीघ्र ही इस गम्भीर व खतरनाक समस्या का हल निकालेगी। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो दिल्ली में डीजल चालित वाहनों के परिचालन पर अंकुश लगाने की कोशिश की गयी। जिससे दिल्ली के वाहन जनित प्रदूषण को कम किया जा सके। 
     अब विशेषज्ञों की मानें तो विश्व के विश्वस्तरीय परिवेश वाले लंदन में भी प्रदूषण कम नहीं है। लंदन में पिछले वर्ष वायु प्रदूषण के विभिन्न कारकों से नौ हजार से अधिक मौतें हो गयीं। इसी यूरोप में ओजोन का प्रदूषण, नेवाड़ा में धूल जनित प्रदूषण व कैलिफोर्निया सहित अमेरिका के कई शहरों में प्रदूषण चरम पर है। विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया के बीस सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से 18 एशियाई देशों में हैं। 
     इनमें सर्वाधिक तेरह शहर तो भारत के हैं। देश, सरकार, नीति-नियंताओं व व्यवस्थाधारकों के लिए यह गम्भीर चिंता का विषय होना चाहिए। एशियाई देशों के 18 शहरों में 13 शहर हिन्दुस्तान के होने से देश के सम्पूर्ण परिवेश के प्रदूषण का आंकलन खुद-ब-खुद कर सकते हैं कि आखिर हम पर्यावरण संवर्धन व प्रदूषण नियंत्रण में नीतियां, कानून, उनका अमल, चिंतन-विचार-विमर्श व मंथन में कहां खड़े हैं।
      गौरतलब है कि भले ही भारत सरकार प्रदूषण नियंत्रण का कोई बड़ा खाका खींच रही हो या कोई बड़ा कानून लाने जा रहा हो लेकिन अभी तक कोई ऐसी बड़ी योजना सामने तो नहीं आयी।कुल मिलाकर देश के नीति-नियंताओं को पर्यावरण संवर्धन व प्रदूषण नियंत्रण के गम्भीर मसले पर गम्भीरता से विचार कर व्यवस्थायें लागू करनी चाहिए। जिससे देश का परिवेश प्रदूषण मुक्त हो सके। व्यवस्थापकों को कानून बनाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, उसके क्रियान्वयन तक निगहबानी सुनिश्चित करनी चाहिए।

Sunday, 20 August 2017

आइए, उद्योग की राह आसान बनाएं

        खाद्यान्न बर्बाद न हो तो शायद कोई भूखा न रहे। प्राकृतिक आपदाओं को छोड़ दिया जाये तो खाद्य पदार्थों-खाद्यान्न को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो देश-दुनिया में सालाना आैसत एक सौ तीस करोड़ टन खाद्य पदार्थ-खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है।

      इसमें विकासशील देशों में करीब तिरसठ करोड़ टन आैर आैद्योगिक दशों में करीब सरसठ करोड़ टन खाद्यान्न-खाद्य पदार्थ बर्बादी की भेंट चढ़ जाता है। एक ओर इतनी बड़ी तादाद में खाद्यान्न की बर्बादी हो जाती है तो वहीं बीस करोड़ से अधिक आबादी को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता। इस बर्बादी को रोक कर देश-दुनिया के करोड़ों इंसानों को भरपेट भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है तो भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। भूख से मौतों को रोका नहीं जा सकता तो कम अवश्य किया जा सकता है। 
      हां, यह अवश्य है कि उपलब्ध खाद्यान्न-खाद्य पदार्थ जरुरतमंद तक पहंुचाना भी आसान नहीं होता लेकिन कुशल एवं बेहतर प्रबंधन से सब कुछ संभव होगा। देश में खाद्यान्न-खाद्य पदार्थों की बर्बादी तीस से पचास प्रतिशत का आंकड़ा करीब-करीब हर साल पार कर जाती है। यह बर्बादी कहीं तीस तो कहीं पचास प्रतिशत होती है। अब उत्तर प्रदेश को ही लें तो सालाना पैंतीस से चालीस प्रतिशत सब्जी व फल नष्ट-खराब हो जाते हैं। समुचित प्रबंधन व खाद्य प्रसंस्करण से इस बर्बादी को रोका जा सकता है।
        हालांकि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय वर्ष 2008 से देश भर में मेगा फूड पार्क की योजना क्रियान्वित कर रहा है। मेगा फूड पार्क की स्थापना के लिए भारत सरकार का यह मंत्रालय पचास करोड की आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करा रहा है। इस योजना के तहत खेत-खलिहान से खुदरा बाजार व मेगा मॉल्स तक आधुनिक बुनियादी ढ़ांचागत सुविधाओं के विकास व स्थापना के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जा रही है। 
      आवश्यक है कि इसके लिए न्यूनतम पचास एकड़ क्षेत्र भूमि हो। इसमें आधुनिक भण्डारण, शीत भण्डारण, पैकेजिंग सिस्टम, बिजली,पानी व सड़क जैसी आवश्यक सुविधायें शामिल हैं। व्यवस्थायें हैं कि पर्यावरण व सुरक्षा के मानकों का पालन सुनिश्चित करने के साथ उत्पाद गुणवत्ता की कसौटी पर भी खरे हों क्योंकि तभी उत्पाद राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय मार्केट में मुकाबला कर सकेंगे। 
     खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय अब तक देश में 42 मेगा फूड पार्क की स्थापना की स्वीकृति दे चुका है। इनमें से दो दर्जन से अधिक मेगा फूड पार्क विकसित हो रहे हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की इस योजना के लांच होने के बाद वर्ष 2008 से अब तक उसके सामने सत्तर से अधिक प्रस्ताव आये। फिलहाल देश के 11 राज्यों के 21 प्रस्तावों को मंत्रालय की हरी झण्डी दी जा चुकी है।
      इन नव चयनित 21 मेगा फूड पार्कों की स्थापना के बुनियादी ढ़ांचागत विकास में करीब दो हजार करोड़ की धनराशि का निवेश होगा तो वहीं इन पार्को में पांच सौ से अधिक आैद्योगिक संस्थान होंगे। इनमें करीब चार हजार करोड़ का निवेश होगा। इन आैद्योगिक संस्थानों का सालाना कारोबार आठ हजार करोड़ होने का अनुमान है। खास बात यह है कि इन आैद्योगिक संस्थानों के व्यवस्थित संचालन से अस्सी हजार से एक लाख रोजगार के अवसर बनेंगे।
       इतना ही नहीं पांच लाख से अधिक किसान-काश्तकार प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लाभान्वित होंगे। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग विकसित होना व उनका व्यवस्थित तौर से संचालित होना भी किसी चुनौती से कम नहीं क्योंकि इस राह में रोड़े भी कम नहीं होते। भारत सरकार का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय मेगा फूड पार्क की स्थापना के लिए भले ही आर्थिक सहायता उपलब्ध करा हो लेकिन भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करना-कराना प्रदेश सरकारों का उत्तरदायित्व है।
      खाद्य प्रसंस्करण की योजनायें बनाना तो आसान दिख रहा है लेकिन भूमि की उपलब्धता में दिक्कतें आना लाजिमी व स्वाभाविक है। अभी हाल में एक मैसेज वायरल हुआ। मैसेज यह कि 'दस साल पहले तैयार किया गया था भूमि अधिग्रहण बिल, 46 इंच के सीने ने योजना बनायी, 56 इंच सीने वाले चिल्लाये, अब 34 इंच सीने वाले लागू करेंगे"... इस सोच-विचार को बदलना होगा। लाभ-क्रेडिट मिलने की राजनीतिक-रीति-नीति से दलों को परहेज करना होगा। विकसित राष्ट्र की अवधारणा केवल चिंतन-मनन-विमर्श व मंथन से साकार नहीं होगी। 
       इसके लिए राजनीतिक लाभ-क्रेडिट को मन-मस्तिष्क से हटा कर यर्थाथ पर सोचना चाहिए क्योंकि तभी योजनायें फलीभूत होंगी। मेगा फूड पार्क की योजना भले ही भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने तैयार की हो लेकिन इनके क्रियान्वन-अमल में प्रदेश सरकारों की भूमिका अहम होगी। अब देश के सबसे बड़े राज्यों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश को ही लें तो उत्तर प्रदेश में छोटे-मध्यम व बड़े खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की संख्या पैंतीस हजार से अधिक है फिर भी पैंतीस से चालीस प्रतिशत सब्जी व फल की सालाना बर्बादी होती है। 
     हालांकि देश में भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की ओर से 21 मेगा फूड पार्क को स्वीकृति दी चुकी है। इनमें से कई एक शासकीय आैद्योगिक विकास क्षेत्र में प्रस्तावित हैं तो वहीं बड़ी संख्या में प्राईवेट सेक्टर (निजी क्षेत्र) में प्रस्तावित हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय से स्वीकृत प्रस्तावों के तहत केरल के अलापुझा में, तेलंगाना के खाममाम में, हरियाणा के सोनीपत में, ओडिसा के खुरदा में, पंजाब के लुधियाना में आैर आंध्र प्रदेश के कृष्णा में मेगा फूड पार्क बनेंगे।
      इन मेगा फूड पार्क के लिए शासकीय आैद्योगिक विकास क्षेत्र में भूमि का प्रबंध किया गया है। इसी तरह गुजरात के कच्छ में, महाराष्ट्र के वर्धा में, मध्य प्रदेश के देवास में, तमिलनाडु के कृष्णागिरि में, तेलंगाना के महबूब नगर में, हरियाणा के पानीपत में, बिहार के बक्सर में तमिलनाडु के थिरुवैल्लयूर में, केरल के पलक्कड में, पंजाब के कपूरथला व महाराष्ट्र के अहमद नगर में मेगा फूड पार्क बनेंगे। इन सभी मेगा फूड पार्क के लिए भूमि का प्रबंध निजी क्षेत्र ने किया है। 
    लाजिमी है कि इन क्षेत्रों में आैद्योगिक विकास होने से आर्थिक सम्पन्नता के रास्ते खुलेंगे। राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि होगी तो वहीं रोजगार के अवसर विकसित होंगे। जाहिर सी बात है कि रोजगार के अवसर विकसित होंगे तो अधिकतम रोजगार के अवसर स्थानीय बाशिंदों के लिए होंगे। इससे प्रदेश में भी आैद्योगिक विकास की रफ्तार बढ़ेगी। बात चाहे आैद्योगिक विकास की हो या विकसित राष्ट्र की हो.... विकसित राष्ट्र होंगे या फिर समृद्ध देशों की श्रंखला में होंगे तभी किसी अन्य या राष्ट्र की सहायता या मदद में हाथ बढ़ा सकेंगे। 
       अब उदाहरण के तौर पर लें तो नेपाल में भूकम्प आपदा के बाद नेसले ने दो लाख मैगी नूडल्स, आईटीसी ने दो लाख ईप्पी नूडल्स, वाईवाई नूडल्स ने 12 हजार नूडल्स, हल्दीराम ने 25 हजार पैकेट नमकीन, बीकानेर वाला ने पांच हजार पैकेट नमकीन, बीटीडब्ल्यू ने चार हजार पैकेट नमकीन व पेप्सिको इण्डिया ने 60 हजार से अधिक पानी की बोटल्स नेपाल राहत सामग्री के तौर पर भेजीं। यह सब तभी हो सका, जब आैद्योगिक विकास को रफ्तार दी गयी। नीति व नियति से खाद्य पदार्थ व खाद्यान्न की बर्बादी पर भी विराम लगेगा आैर आैद्योगिक विकास को भी रफ्तार मिलेगी।

Friday, 18 August 2017

इच्छाशक्ति से ही बनेंगे देश के शहर स्मार्ट सिटी

    सोच अच्छी हो... सोच विकास की हो... दिशा रचनात्मक हो तो कोई वजह नहीं कि कायाकल्प न हो। शहरों का न केवल कायाकल्प होना चाहिए बल्कि आदर्श-आइडियल शहर विकसित होने चाहिए। कोरी लफ्फाजी, दोहरी नीति-रीति व आरोप-प्रत्यारोप शहरों की दशा-दिशा नहीं बदल सकते। 

 शय-मात के खेल नहीं होने चाहिए। विकास को राजनीति के चश्में से नहीं देखना चाहिए। नफा-नुकसान नहीं सिर्फ विकास की रफ्तार होनी चाहिए। फिर चाहे दिल्ली को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने की बात हो या फिर हैदराबाद या कोलकाता का कलेवर चेंज करना हो, कोई मुश्किल काम नहीं होगा। वायु प्रदूषण से लेकर साफ सफाई तक की समग्र व्यवस्थाओं के सुधार यथार्थ में बदलने चाहिए क्योंकि आज देश के अधिसंख्य शहरों में वायु प्रदूषण एवं शहरी क्षेत्रों में साफ-सफाई की दशा बेहद बदहाल है। जिसका सीधा दुष्प्रभाव शहरी बाशिंदों की सेहत व स्वास्थ्य पर पड़ता है। यह स्थिति से शहरी जीवन की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
          देश समाज व सरकार सभी के लिए यह गम्भीर चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि जनस्वास्थ्य से कहीं न कहीं-कभी न कभी सभी का सरोकार रहता है। बात पानी की हो तो बिजली की भी होनी चाहिए। कोशिश हो कि शहरी विकास का एक समग्र डिजाइन तैयार हो जिसमें सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट से लेकर एनर्जी डेवेलपमेंट सहित सभी कुछ शामिल हो।
     आवश्यक है कि भवन निर्माण नीति में इस तरह की व्यवस्थायें आयें जिससे बिजली की खपत को कम किया जा सके। विशेषज्ञों की मानें तो ऐसा करने से वर्ष 2021 तक 42,000 मेगावाट बिजली बचाई जा सकेगी। 'टेरी" की रिपोर्ट में इस आशय के संकेत भी दिये गये हैं। आवश्यक है कि कूड़ा कचरा सहित अन्य सभी संसाधनों का अपेक्षित उपयोग सुनिश्चित हो। विकास की सतत प्रक्रिया होनी चाहिए। जिसमें संसाधनों का तर्कसंगत इस्तेमाल सुनिश्चित करने के साथ-साथ पर्यावरण एवं सामाजिक पहलुओं का भी पूरा ध्यान रखा जाता हो।
         शहरों में फैले कूड़ा-कचरा को उर्जा, ईंधन, उर्वरक एवं सिंचाई जल में तब्दील करने की योजनायें बननी चाहिए जिससे निस्तारण भी हो आैर आवश्यकताओं की पूर्ति भी हो। इसमें आैद्योगिक घरानों व उद्योग जगत की भूमिका विशेष व महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत सरकार का शहरी विकास मंत्रालय इस दिशा में कोशिश कर रहा है लेकिन कोशिशें सार्थक आयाम लेते दिखनी चाहिए क्योंकि सार्थक परिणाम ही देश की आवाम-देश की आबादी को अपेक्षित लाभ दे सकेंगी। 
         भारत सरकार का शहरी विकास मंत्रालय इस दिशा में कार्यरत देश-विदेश की कम्पनियों व संस्थाओं की खोजबीन कर रहा है। कोशिश है कि इससे कूड़ा कचरा एवं सीवेज की व्यवस्थाओं में सुधार आयेगा। दोबारा इस्तेमाल के लिए किफायती समाधान (सोल्यूशंस) भी सामने आयेंगे। यह सभी रीतियां-नीतियां शहरी विकास के स्वच्छ भारत मिशन, स्मार्ट सिटी व धरोहर शहरी विकास का हिस्सा होंगी। 
       देश के करीब पांच सौ शहरों एवं कस्बों में इस तरह की योजनायें फिलहाल लाने की हलचल दिख रही है। शहरी विकास मंत्रालय की माने तो प्रथम श्रेणी व द्वितीय श्रेणी में आने वाले शहरों से नित्य-प्रतिदिन एक लाख तेंतीस हजार मीट्रिक टन कूड़ा-कचरा व ठोस अपशिष्ठ उत्पन्न होता है। इतना ही नहीं इन शहरों से हर दिन तकरीबन अडतीस हजार पांच सौ मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। देश के शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने का कार्य भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा। 
        शहरी विकास मंत्रालय सहित अन्य मंत्रालयों की कोशिश है कि देश में एक सौ स्मार्ट सिटी बनाये जायें। शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने से पहले शहरी विकास मंत्रालय ने राज्यों व नौकरशाहों से विचार-विमर्श व मंथन कर जानना चाहा कि वह वाकई शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के प्रति गम्भीर हैं अथवा नहीं क्योंकि भारत सरकार अपेक्षित धनराशि तो उपलब्ध करा सकता है लेकिन क्रियान्वयन या अमल में लाना तो राज्य सरकारों व नौकरशाहों का उत्तरदायित्व होगा। 
      कारण इच्छाशक्ति ही योजनाओं को आकार दे सकती है। स्मार्ट सिटी बनाने के लिए स्मार्ट नेतृत्व, स्मार्ट गवर्नेंस, स्मार्ट टेक्नॉलॉजी व स्मार्ट नागरिक भी होने चाहिए क्योंकि इन सभी के संयुक्त प्रयास से शहर स्मार्ट बनेंगे। शहर स्मार्ट तभी होंगे, जब शहर साफ सुथरे होंगे। बीमारियां दूर रहेंगी। इससे अर्थव्यवस्था भी सुधरेगी। जनस्वास्थ्य का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। शहरों में पर्याप्त व अपेक्षित साफ सफाई व स्वच्छता न होने से बीमारियां फैलती हैं। 
        शहरी विकास मंत्रालय की मानें तो इस कारण प्रत्येक वर्ष सकल घरेलू उत्पाद का 6.40 प्रतिशत यानी 54 बिलियन डालर का बोझ देश की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ता है। इतना ही नहीं प्रत्येक वर्ष डायरिया से 18 लाख लोग मर जाते हैं। हालात यह हैं कि अस्सी प्रतिशत बीमारियां जल जनित हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद 19 प्रतिशत शहरी घरों में शौचालय नहीं है। इतना ही नहीं 13 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं। स्वच्छता के लिए मानसिकता बदलने के साथ-साथ व्यापक स्तर पर जागरुकता की आवश्यकता है।
        तभी स्वच्छ भारत, स्वच्छ समाज व स्मार्ट सिटी की परिकल्पना साकार होगी। देश की राजधानी दिल्ली को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने की बात हो या देश के प्रमुख शहरों को स्मार्ट सिटी के रुप में विकसित करने की परिकल्पना हो या फिर देश के खास शहरों को सांस्कृतिक-पौराणिक-धार्मिक या धरोहर शहर के रूप-रंग में तब्दील करने की वैचारिकी हो.... यह सभी तभी फलीभूत होंगें, जब देश व प्रदेश संयुक्त तौर पर विकास पथ पर कदमताल करेंगे। करीब एक दशक पहले जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन के तहत उत्तर प्रदेश के कवाल टाउन्स कानपुर, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ सहित देश के कई शहरों में लाख करोड़ की विकास योजनायें लागू की गयी थीं। 
         जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) की यह विकास योजनायें अभी तक आयाम नहीं ले सकीं। भले ही कारण कुछ भी रहे हों लेकिन देश की आम जनता को अभी तक न तो सुगम परिवहन सेवायें सुलभ हो सकीं आैर न साफ सुथरा पीने का पानी ही उपलब्ध हो सका बल्कि सप्ताह के सात दिन चौबीस घंटे पीने का पानी उपलब्ध कराने का खाका खींचा जा रहा है। चाहे पीने का पानी हो या फिर परिवहन सेवायें, विकास योजनायें बननी ही चाहिए लेकिन विकास योजनाओं को फलीभूत होने के लिए समयवद्ध उत्तरदायित्व तय होने चाहिए क्योंकि तभी विकास योजनाओं से देश का कॉमनमैन लाभान्वित हो सकेगा। 
       आवश्यक है कि इसके लिए केन्द्र सरकार व देश की राज्य सरकारें दलगत राजनीति से उपर उठ कर विकास योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर उसकी गुणवत्ता के प्रति गम्भीर हों। जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन की योजनाओं के लिए केन्द्र सरकार ने पचास प्रतिशत धनराशि बतौर अनुदान जारी की जबकि इसमें तीस प्रतिशत अंशदान स्थानीय निकाय व बीस प्रतिशत अंशदान प्रदेश सरकार को वहन करने का प्रावधान किया गया था लेकिन केन्द्र सरकार की व्यवस्थाओं में बदलाव दिखे। 
          अब शहरी विकास के लिए केन्द्र सरकार ने कई मायनों में राज्य सरकारों पर निर्भरता की रीति-नीति को छोड़ दिया। धरोहर शहर विकास योजना के तहत अब केन्द्र सरकार परियोजना खर्च खुद उठायेगगा। धरोहर शहर विकास योजना के तहत फिलहाल देश के मुख्य 12 शहर चयनित किये गये हैं। इन एक दर्जन शहरों के लिए केन्द्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने पांच सौ करोड़ रुपये की धनराशि का प्रावधान किया है। इसके पीछे शायद मंशा यह है कि 'संस्कृति व विरासत की अनदेखी कर कोई भी राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता"। 
         शायद इसी सोच के तहत केन्द्र सरकार ने देश के चुंनिदा शहरों को अपेक्षित विकास की स्पीड़ देने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों की मानें तो धरोहर शहर विकास योजना का लक्ष्य शहरों की विरासत को सुरक्षित व संरक्षित रखना है। साथ ही शहरों का समेकित, समावेशी और सतत विकास करना है। इसके तहत केवल स्मारकों के रख रखाव पर ही नहीं, बल्कि शहर के नागरिकों, पर्यटकों और स्थानीय व्यवसायों को बढ़ावा देना है। यूनेस्को ने तीस से अधिक विरासत स्थलों को मान्यता देकर सुरक्षित व संरक्षित किया है। 
        विशेषज्ञों की मानें तो भारत का एशिया में दूसरा और विश्व में पांचवां स्थान है, जो विरासत शहरों व स्थलों के प्रति गम्भीर है। देश में पर्यटन की संभावनाओं का अभी तक पूरा लाभ नहीं उठाया जा सका क्योंकि अपेक्षित विकास न होने से पर्यटन शहरों व स्थलों की ओर पर्यटकों को आकर्षित नहीं किया जा सका। संभव है कि शहरी विकास मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय व पर्यटन मंत्रालय की नयी योजनायें कोई नया आकार गढ़ें। 
        धरोहर शहर विकास योजना के तहत आबादी के आधार पर काशी-बनारस को 89.31 करोड़ रुपए, अमृतसर को 69.31 करोड़ रुपए, वारंगल को 40.54 करोड़ रुपए तथा अजमेर, गया व मथुरा को चालीस-चालीस करोड़ रुपए, कांचीपुरम को 23.04 करोड़ रुपए और वेलानकिनी, अमरावती, बदामी एवं द्वारका को करीब पच्चीस-पच्चीस करोड़ रुपए तथा पुरी को 22.54 करोड़ रुपए मिलेंगे। विकास की यह नयी चुनौतियों अब स्थानीय निकायों के सामने खरा उतरने की हैं।
        शहरी स्थानीय निकायों को परियोजनाओं के विकास के लिए धनराशि तो केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय उपलब्ध करायेंगे लेकिन योजनाओं को आकार देने का उत्तरदायित्व तो स्थानीय निकायों पर रहेगा। हालात यह हैं कि शहरों के विकास में अब पारम्परिक चाल-ढ़ाल व रवैया नहीं चलेगा कि केन्द्र सरकार ने धनराशि जारी कर दी आैर राज्यों ने विकास की आैपचारिकतायें पूरी कर इतिश्री कर ली क्योंकि यदि शहरों का समग्र या सम्पूर्ण विकास चाहिए तो विकास को एक चुनौती के रूप में जनप्रतिनिधियों से लेकर नौकरशाहों को लेना होगा। 
        शहरी प्रशासन में सुधार और नई चुनौतियों पर खरा उतरने की क्षमता शहरी स्थानीय निकायों में होनी चाहिए। इसी क्षमता के आधार पर शहरी विकास मंत्रालय स्मार्ट सिटी के लिए शहरों को चयनित करेगा। शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू खुद इस आशय के संकेत दे चुके हैं। भारत सरकार का शहरी विकास मंत्रालय फिलहाल देश के सौ स्मार्ट शहरों और पांच सौ शहरों व कस्बों में विकास के रंग भरने की योजनाओं पर कार्य कर रहा है। 
       कोशिश है कि विकास के इस इन्द्रधनुष में जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन के अनुभव के रंग भरे जायें। व्यवस्थाओं को देखें तो देश में प्रति व्यक्ति प्रति दिन एक सौ पैंतीस लीटर पानी उपलब्ध होना चाहिए लेकिन उपलब्धता पचहत्तर लीटर से भी कम है। शहरी क्षेत्र में पचास फीसदी परिवारों या आवासों में पानी कनेक्शन हैं। हालात यह हैं कि शहरी क्षेत्र में सिर्फ चालीस प्रतिशत में घरों में शौचालय की व्यवस्था है तो वहीं सोलह से बीस फीसदी सीवरेज शोधित हो पाता है। 
       इतना ही नहीं शहरी क्षेत्र में कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या है। करीब बीस से पच्चीस फीसदी कचरा का अपेक्षित निस्तारण हो पाता है।कचरा रिसाइकिलिंग की व्यवस्था अत्यधिक कमजोर है क्योंकि बमुश्किल दस फीसदी कचरा ही रिसाइकिल हो पाता है। विशेषज्ञों की मानें तो अगले बीस वर्षों में बुनियादी ढ़ाचे में सुधार के लिए चालीस लाख करोड़ चाहिए होंगे।
       इसके साथ ही व्यवस्थाओं के संचालन एवं शहरी उपयोगिताओं के रखरखाव के लिए करीब बीस लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी। आवासों की कमी को पूरा करने के लिए भी बड़ी धनराशि चाहिए होगी। विशेषज्ञों की मानें तो 15 लाख करोड़ रुपए आवास की कमी को पूरा करने के लिए और 60 हजार करोड़ रुपए स्वच्छता के लिए आवश्यक है। हालात पर गौर करें तो इन सबके लिए कुल एक हजार दो सौ बिलियन अमेरिकी डालर की आवश्यकता है। अब सरकार की कोशिश है कि इसका अधिसंख्य हिस्सा निजी क्षेत्र से आये।

Thursday, 17 August 2017

देश को दुनिया का पर्यटन हब बनाने की कोशिश

      'अतुल्य भारत" केवल शब्द भर नहीं बल्कि इसमें भारतीय संस्कृति, संस्कार व देश का वैशिष्टय एवं भव्यता की आभा अवलोकित होती है।

     'अतुल्य भारत" के परिप्रेक्ष्य में भारत को विश्व का 'पर्यटन हब" बनाने की कोशिशें आयाम लेते दिख रहीं हैं क्योंकि चाहे विश्वविख्यात धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी 'काशी" हो या शिपिंग मंत्रालय के लाइट हाउस हों... सभी को नया आयाम-नया इन्द्रधनुषी रंग देने की कोशिशें हो रही हैं। भारत सरकार की कोशिश है कि शिपिंग मंत्रालय के प्रकाश स्तम्भ (लाइट हाउस) की श्रंखला को पर्यटन स्थल-केन्द्र के रुप-रंग में तब्दील करें। 
        पर्यटन दिवस पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुनिया के विशिष्टजनों को भारत भ्रमण के लिए आमंत्रित किया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग को भारत आने का न्योता दिया था। फेसबुक संस्थापक जुकरबर्ग शायद इसी परिप्रेक्ष्य में भारत आये भी आैर आगरा के ताजमहल का दीदार किया। ताजमहल के सौन्दर्य से इतना अधिक प्रभावित हुये कि उन्होंने यहां तक कहा कि शीघ्र ही पत्नी को साथ लेकर ताजमहल देखने आयेंगे। 
           केन्द्रीय पर्यटन मंत्री डा. महेश शर्मा का कथन है कि भारत को विश्व का पर्यटन हब बनायेंगे। भारत के विशिष्ट स्थलों, धरोहरों व सौन्दर्य से लबरेज वास्तुशिल्प की कलाकृतियों की वास्तविकता को बरकरार रखते हुये इन्द्रधनुषी आयाम देने की कोशिश हो रही है। इसके लिए भारत व कंबोडिया ने पर्यटन विकास पर 'हम साथ साथ" के सिद्धांत पर सहमति दी है। इससे भारत व कंबोडिया के पर्यटन स्थलों के विकास एवं प्रबंधन से लेकर सांस्कृतिक मेलों-प्रदर्शनियों के आदान-प्रदान के अवसर भी खुलेंगे। 
           पर्यटन क्षेत्र को सेवाओं-सुविधाओं से परिपूर्ण बनाने की दिशा में भारत सरकार रीति-नीति का भी निर्धारण कर रही है। पर्यटन को चाहे चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से जोड़ने की बात हो या फिर सुरक्षा एवं स्वच्छंदता की राह हो, भारत सरकार का संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय सार्थक आयाम-परिणाम देने वाली रीति-नीति पर मंथन कर रहा है।
          इसी परिप्रेक्ष्य में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य पर्यटन बोर्ड को अस्तित्व में लाया गया। शासकीय रीति-नीति में पर्यटकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता में है क्योंकि पर्यटन को बढ़ावा तभी मिलेगा, जब पर्यटक सुरक्षित होंगे। खास तौर से महिला पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना-कराना सरकार के लिए एक बड़ी चुुनौती है। पर्यटक सुरक्षित होंगे तो व्यवसाय से लेकर रोजगार के अवसर बनते-विकसित होते रहेंगे।
        स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को ध्यान में रख कर भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने अतुल्य भारत हेल्पलाइन चालू की है। 'अतुल्य भारत" हेल्पलाइन के टोल फ्री नम्बर 1800111363 एवं 1363 पर्यटकों को सुविधा-सहूलियत के लिए जारी किये गये हैं। अब सरकार के सामने इसकी उपयोगिता एवं सार्थकता की चुनौती है। अब चाहे  स्वास्थ्य की बात हो या सुरक्षा की बात हो हेल्पलाइन समय पर पर्यटकों को पर्याप्त सुरक्षा व स्वास्थ्य सेवायें समय पर उपलब्ध हो सकें, यह एक बड़ी चुनौती है। 
          फिलहाल मंत्रालय ने हेल्पलाइन पर हिन्दी व अंग्रेजी भाषा की सुविधा दी है लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो शीघ्र ही मंत्रालय एक दर्जन अंतरराष्ट्रीय भाषाओं से हेल्पलाइन को जोड़ेगा। यह अंतरराष्ट्रीय भाषायें दुनिया के पर्यटकों की दिक्कत व परेशानी समझने व उनके निदान में सहायक व मददगार साबित होंगी। पर्यटक सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रख कर मंत्रालय ने पर्यटक पुलिस का गठन किया है।
        पर्यटन क्षेत्र में पर्यटक सुरक्षा व उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखना केन्द्र व प्रांतीय सरकारों के लिए एक बड़ी व गम्भीर चुनौती से कम नहीं क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी हो या उडीसा से उत्तराखण्ड हो.... कहीं लालित्य, सौन्दर्य व माधुुर्य से परिवेश लबरेज दिखता है तो प्राकृतिक सौन्दर्य अपनी आभा से परिवेश को आलोकित करता है। 
       देश के इन सभी पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों को पर्याप्त सुरक्षा व स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध करना-कराना नीति-नियंताओं के लिए आसान नहीं होगा। वन अभ्यारणों के भ्रमण की बात हो या गोवा में समुद्र तटीय आनन्द लेने की बात हो, पर्यटक सुरक्षा कदम-कदम पर उपलब्ध करना-कराना अत्यन्त मुश्किल कार्य है। सरकार के सामने एक ओर पर्यटक सुरक्षा व स्वास्थ्य सेवायें एक गम्भीर चुनौती के रुप में है तो वहीं पर्यटन विकास की लम्बी योजनायें आकार लेती दिख रही हैं।
           शिपिंग मंत्रालय एवं प्रकाशस्तम्भ एवंं प्रकाशपोत महानिदेशालय देश में पौन सैकड़ा से अधिक करीब 78 प्रकाशस्तम्भ (लाइट हाउस) को पर्यटन केन्द्र या पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने की योजना पर कार्य कर रहा है। फिलहाल गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, लक्षद्वीप, तमिलनाडु, पुंडुचेरी, आंध्र प्रदेश, ओडिसा, अण्डमान निकोबार एवं पश्चिम बंगाल शामिल हैं। प्रकाशस्तम्भ को पर्यटन स्थल या केन्द्र के रुप मे विकसित करने से आसपास के इलाकों का भी विकास होगा।
         पर्यटकों को आकर्षित करने की इस योजना के तहत होटल-मॉल्स, रिजॉर्टस, समुद्री संग्रहालय, विरासत संग्रहालय, साहसिक खेल सुविधायें, यादगार वस्तुओं की बिक्री व प्रदर्शनी, लेजर शो, स्पा एवं कायाकल्प केन्द्र, रंगभूमि-थियेटर व अन्य पर्यटन आकर्षण की कलाकृतियां सहित बहुत कुछ विकसित होंगे। विशेषज्ञों की मानें तो गोवा के अगुवाड़ा, ओडिसा के चन्द्रभागा, महाबलीपुरम, कन्याकुमारी, तमिलनाडु के मुत्तोम, केरल में कडालुर प्वाइंट, महाराष्ट्र के कई इलाकों में परियोजनाओं पर तेजी से कार्य चल भी रहा है।
          गौरतलब है कि प्रकाशस्तम्भों का उपयोग सदियों से जहाज चलाने वालों के आवागमन के संकेत दीपों के रुप में रहा। व्यापक बदलाव के क्रम में अब इनकी उपयोगिता देखी जा रही है। प्रबंधन व नीति-नियंता दुनिया के प्रकाशस्तम्भ व उसके आसपास सुन्दर व शांत वातावरण व समृद्ध समुद्री विरासत की बदौलत पर्यटकों को आकर्षित करने में कामयाब रहे। प्रकाशस्तम्भ क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाओं को देखते हुये देश के शिपिंग मंत्रालय ने प्रकाशस्तम्भों को पर्यटन केन्द्र में तब्दील करने की नीति अपनायी है।
         विशेषज्ञों की मानें तो देश की करीब 7517 किलोमीटर लम्बी विशाल तयीय रेखा पर 189 प्रकाशस्तम्भ संचालित हैं। बंगाल की खाड़ी में स्थित अण्डमान एवं निकोबार द्वीप तथा अरब सागर स्थित लक्षद्वीप इनमें शामिल हैं। देश के समृद्ध समुद्री विरासत से युक्त प्रत्येक प्रकाशस्तम्भ की अपनी विशिष्ट गाथा है। जहाज चलाने वालों के लिए इनकी विशिष्टता अलग ही है।
        विशेषज्ञों की मानें तो इन प्रकाशस्तम्भ में पर्यटन की अपार संभावनायें हैं। देश को इनका लाभ लेना चाहिए। तमिलनाडु में चेन्नई एवं महाबलीपुरम, केरल में अलेप्पी एवं कन्नानूर प्रकाशस्तम्भ को पर्यटन केन्द्र के रुप में विकसित किया जा चुका है। देश-दुनिया के लाखों पर्यटकों की आवाजाही से चकाचौंध दिखती है।
        केन्द्र व प्रांत सरकारों को चाहिए पर्यटकों की सेवाओं-सुविधाओं का विशेष ख्याल रखें क्योंकि इससे क्षेत्र का विकास होगा तो वहीं रोजगार के अपार अवसर भी विकसित होंगे। 'अतिथि देवो भव:" की भावना सभी में होनी चाहिए। चाहे वह देश का सामान्य नागरिक हो या शासकीय व्यवस्थाओं से ताल्लुक रखने वाला नौकरशाह हो। राष्ट्र बढ़ेगा तो आप भी आगे बढ़ेंगे।

                 

भोजन को बर्बाद होने से भी बचाएं

        'कॉमनमैन" की शक्ति-पॉवर को कम नहीं आंकना चाहिए क्योंकि 'कॉमनमैन" ही देश-दुनिया में इंकलाब लाता है। चाहे सिल्वर स्क्रीन की फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस" का डॉयलॉग 'डोंट अण्डर स्टीमेट द पॉवर ऑफ कॉमनमैन" हो या किसी राजनीतिक मंच से 'आम आदमी" की बात की जा रही हो।

     राजनीतिक मंच हो या फिर सिल्वर स्क्रीन की फिल्म हो.... 'कॉमनमैन" के लिए 'डॉयलॉग" तो अच्छा लगता है। फिल्म के दर्शक हों या फिर राजनीतिक मंच के श्रोता हों.... तालियां खूब बजाते हैं.... वाह-वाह भी खूब होती है लेकिन अफसोस 'कॉमनमैन" की दशा-दिशा से समाज से लेकर सरकार तक सभी बेपरवाह दिखते हैं क्योंकि यदि समाज-सरकार की बेपरवाही न होती तो देश-दुनिया में करोड़ों बाशिंदे भूखे या आधे पेट खाना खाकर न सोते।
          राजनीतिक गलियारों के विशेषज्ञों की मानें तो देश में दस वर्ष के दौरान पांच लाख बाशिंदे भूख से मर गये। अब सरकार की नजर से देखें तो भी दस वर्ष में 2.10 लाख लोग भूख से मर गये। भारत भले ही दुनिया में तीसरी महाशक्ति के तौर पर उभरा हो लेकिन हकीकत यह है कि भारत ने भुखमरी में पाकिस्तान व श्रीलंका को भी पीछे छोड़ दिया।
     विशेषज्ञों की मानें तो देश का 44 प्रतिशत बचपन भुखमरी का शिकार है। ऐसा नहीं है कि देश-दुनिया में खाद्यान्न का कहीं कोई गंभीर संकट खड़ा है जिससे आबादी को खाना नहीं मिल रहा है। हालात यह हैं कि दुनिया में सालाना एक अरब तीस टन भोजन-खाना बर्बाद हो जाता है। देश में ही 50 से 60 करोड़ धनराशि का खाना सालाना बर्बाद चला जाता है।
           अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि बर्बाद होने वाले खाने से कितने लोगों का खाली पेट भरा जा सकता है। भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। हालांकि दिल्ली में 'इण्डिया फूड बैंकिंग नेटवर्क" शुरू किया गया है लेकिन इसकी सार्थकता तो तभी है, जब भूख से तड़पते-मरते गरीब का पेट भरा जा सके। अब विशेषज्ञों की मानें तो शादी, विवाह, साामाजिक कार्यक्रमों की दावतों में पन्द्रह से बीस प्रतिशत खाना बर्बाद हो जाता है। खाना-भोजन की इस बर्बादी को रोका जा सकता है। 
       एक बेहतर नेटवर्किंग के जरिये बर्बाद होने वाले खाना से गरीब-मजदूर-लावारिस, बेसहारा, बच्चों-बड़ों-बूढ़ों का पेट भरा जा सकता है। इससे भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। हालांकि मौत होने पर तर्क दिया जाता है कि गर्मी में मौत लू लगने से हो गयी तो सर्दी में तर्क दिया जाता है कि मौत सर्दी लगने से हो गयी लेकिन चिकित्सा वैज्ञानिकों की मानें तो सर्दी हो या गर्मी खाली पेट होने पर लू भी लगेगी आैर सर्दी भी लगेगी, जिससे मौत भी हो सकती है।  
       साफ जाहिर है कि मौतें भूख से होती है लेकिन उत्तरदायित्व से बचने के लिए तर्क तो दिये ही जा सकते है। अफसोस भूख से होने वाली मौत को रोकने के लिए अभी तक कोई भी सार्थक उपाय नहीं किये गये। हालांकि भोजन की बर्बादी को रोक कर कुपोषण व भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। भूख से होने वाली मौतों को रोका नहीं जा सकता तो कम से कम इसे न्यूनतम अवश्य किया जा सकता है। 
     आवश्यक है कि फूड़ बैंक की ऐसी व्यवस्था बने जो शादी-विवाह व अन्य सार्वजनिक समारोह की दावतों में बर्बाद होने वाले भोजन को बर्बाद होने से बचा सके। इसके लिए एक संचार संसाधनों से युक्त बेहतर नेटवर्क बनना चाहिए।
         शादी-विवाह, सार्वजनिक समारोह की दावतों का भोजन बचने की सूचना समय से फूड़ बैंक को दी जाये जिससे फूड़ बैंक उसे संग्रहित कर संरक्षित कर ले। फूड़ बैंक में व्यवस्थित स्टोर्स हों, जहां भोजन को खराब होने से बचाया जा सके। इन फूड़ स्टोर्स से जरुरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित किया जाये। इससे भोजन की बर्बादी भी रुकेगी आैर जरुरतमंद व्यक्ति-परिवारों तक भोजन पहंुच सकेगा।

                           

Wednesday, 9 August 2017

फ्लाई एश का प्रदूषण भी कम नहीं

           'शोध-अनुसंधान" एवं 'खोज तथा विकास" की रीति नीति निश्चय ही देश में बदलाव लायेगी। बदलाव के लिए आवश्यक है कि शासन-सत्ता से लेकर नीति नियंताओं को विचार-विमर्श-मंथन पर बल देना चाहिए क्योंकि विचार-विमर्श-मंथन निश्चय ही विकास के पथ खोलने में सहायक सिद्ध-साबित होंगे।

       देश में कोयला की उपलब्धता व विद्युत उत्पादन में वृद्धि करना किसी चुनौती से कम नहीं। इससे भी बड़ी एक आैर चुनौती देश व समाज के सामने है। यह चुनौती है विद्युत उत्पादन से निकलने वाली फ्लाई एश का अपेक्षित एवं समुचित उपयोग सुनिश्चित करना। देश में करीब सत्तर से बहत्तर प्रतिशत विद्युत उत्पादन में कोयला का उपयोग किया जाता है। 
     करीब अस्सी विद्युत उत्पादन इकाईयों में कोयला का उपयोग होता है। विशेषज्ञों की मानें तो इनसे लगभग सौ मिलियन टन फ्लाई एश सालाना निकलती है। फ्लाई एश का भण्डारण विद्युत उत्पादन इकाईयों के लिए एक बड़ी समस्या है तो वहीं विद्युत उत्पादन में चिमनियों से फ्लाई एश निकलना इलाकाई बाशिंदों के लिए परेशानी का सबब भी है। फ्लाई एश से परिवेश तो दूषित होता ही है बाशिंदों के सामने स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का होना भी लाजिमी है।
          विशेषज्ञों की मानें तो फ्लाई एश से कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन आबादी-बाशिंदों के लिए एक बड़ा खतरा है। कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन में अमेरिका व चीन के बाद भारत सबसे बड़ा उत्सर्जक है। इस तरह देखें तो वायु मण्डल प्रदूषण में भारत विश्व का तीसरा बड़ा देश है। जन स्वास्थ्य के गम्भीर खतरा को देखते हुये कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन से बचना चाहिए।
         बचाव पूरी तरह से न हो पाये तो इसे न्यूनतम अवश्य करना चाहिए। विद्युत उत्पादन इकाईयों के सामने भी समस्या कम नहीं है क्योंकि फ्लाई एश के भण्डारण के लिए धनराशि व भूमि का प्रबंधन करना आवश्यक है। अब फ्लाई एश के अपेक्षित उपयोग की वकालत होनी चाहिए क्योंकि इससे एक तो फ्लाई एश की उपयोगिता सुनिश्चित हो जायेगी तो वहीं फ्लाई एश से उत्पादित वस्तु-सामग्री का राष्ट्र निर्माण में अपेक्षित उपयोग भी सुनिश्चित हो सकेगा। 
       फ्लाई एश का उपयोग सड़क बनाने, सीमेंट का उत्पादन, कंक्रीट के ब्लाक अर्थात टाइल्स बनाने में किया जा सकता है। भारत सरकार के केन्द्रीय र्इंधन अनुसंधान केन्द्र ने खोज तथा विकास कार्यक्रम में फ्लाई एश से र्इंट बनाने की वकालत की है। हालांकि र्इंट बनाने के लिए फ्लाई एश का उपयोग पहले से ही हो रहा है लेकिन अभी यह उपयोग कमतर हो रहा है।
          विशेषज्ञों की मानें तो अभी र्इंट बनाने के लिए फ्लाई एश का उपयोग चालीस से पैंतालिस प्रतिशत तक ही हो रहा है। र्इंट बनाने के लिए फ्लाई एश का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए। इससे देश व समाज को कई फायदे होंगे। एक तो र्इंट उत्पादन के लिए मिट्टी की खोदाई नहीं करनी होगी तो वहीं फ्लाई एश का उपयोग हो जायेगा जिससे विद्युत उत्पादन इकाईयों को धन व भूमि का प्रबंधन करने से काफी हद तक निजात मिल जायेगी। फ्लाई एश के भण्डारण को न्यूनतम करने से भू-गर्भ जल व भूमि को प्रदूषित होने से भी बचाया जा सकेगा।
      भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाये रखने या बचाने के लिए आवश्यक है कि फ्लाई एश की उपयोगिता प्राथमिकता पर सुनिश्चित करनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि अभी तक इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हुये लेकिन प्रयास सार्थक आयाम नहीं ले सके। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने वर्ष 1999 में अधिसूचना जारी कर देश के स्थानीय निकाय व डेवलपमेंट अथारिटी को दिशा निर्देश दिये थे कि भवन उप विधियों व नियमों में व्यवस्था करें कि भवन निर्माण, सड़क निर्माण, तट बंध व अन्य निर्माण में फ्लाई एश आधारित उत्पादों का उपयोग शामिल व सुनिश्चित किया जाये। 
           अफसोस, यह आदेश-व्यवस्था अभी तक सार्थक आयाम नहीं ले सकी। अभी हाल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने फ्लाई एश उपयोग के लिए आवश्यक नियम व व्यवस्थायें तय करने के दिशा निर्देश दिये हैं। शासकीय व्यवस्थाओं से ताल्लुक रखने वाले नीति नियंताओं को फ्लाई एश का अपेक्षित उपयोग सुनिश्चित करने के लिए विचार-विमर्श-मंथन करना चाहिए।
          ऐसी नीति-रीति तय या सुनिश्चित करनी चाहिए जिससे उसके सार्थक परिणाम देश व समाज के सामने दिखें। यथार्थ में उपयोगिता सुनिश्चित हो सके। रीति-नीति केवल बनने के लिए न बने। कारण देश व समाज के लिए वही रीति-नीति मायने रखती है आैर सार्थक रहती है जिसका लाभ समग्र-सम्पूर्ण समाज को मिले।

Tuesday, 8 August 2017

 कबाड़ बेकार नहीं, बेहतर उपयोग करें

        'पॉलीथिन-प्लास्टिक" उपयोग होने के बाद भले ही बेकार-कबाड़ समझ लिया जाता हो लेकिन उसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। हालांकि देश-दुनिया के स्थानीय निकायों को पॉलीथिन-प्लास्टिक के कारण 'सिस्टम" को चलाने में अनेक दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है।

     साइंस एण्ड टेक्नॉलॉजी इंजीनियर्स ने 'पॉलीथिन-प्लास्टिक" के कबाड़ को 'विलेन" से 'हीरो" बना दिया क्योंकि देश-दुनिया में अब 'पॉलीथिन-प्लास्टिक" के कबाड़ का बेहतर उपयोग किया जा रहा है। 'पॉलीथिन-प्लास्टिक" के कबाड़ से कहीं सड़क बन रही है तो कहीं आलीशान 'आशियाना' आकार ले रहा है। इसके लिए बस आपकी सोच सकारात्मक होनी चाहिए । 
      विशेषज्ञों ने 'पॉलीथिन-प्लास्टिक" का अपेक्षित उपयोग कर करीब एक दशक के दौरान बंगलोर सहित कई इलाकों में दो हजार किलोमीटर लम्बी सड़कों का संजाल बिछा दिया। खास बात यह है कि 'पॉलीथिन-प्लास्टिक" का उपयोग कर बनी सड़कों का रखरखाव खर्च न्यूनतम हो गया तो वहीं इन सड़कों पर पानी व तापमान का कोई असर-प्रभाव नहीं होता।
      विशेषज्ञों की मानें तो देश में पॉलीथिन-प्लास्टिक का उत्पादन करने वाले बड़े उद्योगों की संख्या पच्चीस हजार से अधिक है। इनमें बड़ी तादाद में बाटल्स का उत्पादन होता है। विशेषज्ञों की मानें तो प्लास्टिक की बाटल्स को नष्ट होने में 450 वर्ष से भी अधिक समय लगता है। मैक्सिको हो या अफ्रीका, प्लास्टिक बाटल्स का आशियाना बनाने में बेहतर उपयोग हो रहा है। 
        खास बात यह है कि प्लास्टिक बाटल्स से बने खास आशियाना बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। मेक्सिको की क्वाड्रो इको साल्यूशंस के विशेषज्ञ प्लास्टिक की प्लेट्स बना रहे हैं। इन प्लेट्स का उपयोग आशियाना बनाने के लिए किया जा रहा है। करीब बीस वर्ग मीटर का आशियाना बनाने में करीब डेढ़ टन प्लास्टिक का उपयोग होता है। सामान्य तौर पर पचास से साठ वर्ग मीटर क्षेत्रफल का आशियाना बनाने में 3.50 लाख से चार लाख की धनराशि का खर्च होता है। 
      नाइजीरिया में तो कबाड़ प्लास्टिक को पिघलाया भी नहीं जाता क्योंकि इसके लिए एक अन्य रास्ता खोज निकाला गया। नाइजीरिया के बाशिंदों ने प्लास्टिक की बाटल्स को आशियाना बनाने में उपयोग किया। प्लास्टिक की खाली कबाड़ बाट्ल्स में बालू या मिट्टी भर कर नॉयलॉन की रस्सी से एक दूसरे को बांध दिया। बाद में इसे गारा से जोड़ दिया गया।
       इन आशियानों को भूकम्परोेधी भी माना जाता है। गौरतलब है कि दुनिया के तमाम देशों में सालाना करीब दस करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसका बड़ा हिस्सा बाट्ल्स के रूप में होता है। इन बाट्ल्स का 80-90 प्रतिशत हिस्सा कबाड़ में तब्दील हो जाता है। इस कबाड़ का विकास कार्य में बेहतर उपयोग किया जा सकता है क्योंकि विकास एक सतत प्रक्रिया है।
      'पॉलीथिन-प्लास्टिक" के कबाड़ का वैज्ञानिक निस्तारण सुनिश्चित होना चाहिए जिससे पॉलीथिन-प्लास्टिक का कबाड़ समाज-सोसाइटी के लिए खलनायक न बने बल्कि उसकी इमेज एक हीरो की तरह सामने आये। इस कबाड़ को वैज्ञानिक तौर तरीके से डिस्पोजल करने के लिए सांइस एण्ड टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
      इससे विकास को भी एक नया आयाम मिलेगा तो वहीं यह कबाड़ स्थानीय निकायों के सिस्टम को चलाने में बाधायें भी पैदा नहीं करेगा। इतना ही नहीं इससे रोजगार के कुछ नये अवसर भी पैदा होंगे। सरकार को इस दिशा में सार्थक पहल-प्रयास भी करने होंगे।

Monday, 7 August 2017

खुद को बदलें फिर व्यवस्था को कोसें

       कूडा-करकट-गंदगी देख नाक-भौं सिकोड़ते व्यवस्था को कोसने की हमारी नियति बन चुकी है क्योंकि गली गलियारों से लेकर नेशनल हाईवेज के किनारे अक्सर कूड़ा-करकट व गंदगी के पहाड़ खड़े दिख जाते हैं। हालांकि कूड़ा करकट व गंदगी के यह दानव देश-समाज के लिए एक गम्भीर समस्या है। 

        अमूमन कूड़ा-करकट व गंदगी को देख कर कभी हम न्यूयार्क की साफ-सफाई की दुहाई देंगे तो कभी सिंगापुर की शान में कसीदे पढेंगे। फिर कूड़ा-करकट-गंदगी के लिए शासन-सत्ता से लेकर व्यवस्था तक को एक झटके में कोस डालेंगे। सरकार ऐसी है... सरकार वैसी है... व्यवस्था चौपट है... कोई देखने सुनने वाला नहीं। आत्म चिंतन-आत्म मंथन करें तो क्या आप पायेंगे कि अपने शहर गली-मोहल्ले, गांव-गिरावं-गलियारों की साफ सफाई व्यवस्था में सहयोग करना हमारा कोई नैतिक धर्म कर्तव्य नहीं है....? जी हां, शासन-सत्ता या व्यवस्था को कोसने व दोष देने से गांव गिरांव से लेकर मेगाटाउंस चकाचक नहीं दिखने वाले। 
        भले ही भारत सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय डर्टी गर्ल विद्या बालन को साफ-सफाई के लिए ब्रांड एम्बेसडर क्यं न बना दे लेकिन क्या...? इससे शहर की सड़कें व गांव के गलियारे लकालक चमकने लगेंगे। जी नहीं... क्योंकि जब तक हमारी मानसिकता... सोच... सिविक सेंस में बदलाव नहीं आयेगा, तब तक हम गांव-गलियारा व सड़क तो छोडिए अपना घर तक साफ-सुथरा नहीं रख पायेंगे। गौर करें तो पायेंगे कि देश में प्रतिदिन करोड़ों मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। 
       अफसोस दक्षिण भारत के कुछ राज्यों को छोड़ दें तो देश में कूड़ा-करकट-गंदगी के अपेक्षित व वैज्ञानिक निस्तारण या डिस्पोजल की कहीं कोई व्यवस्था नहीं है। विशेषज्ञों की मानें तो प्रति व्यक्ति प्रतिदिन छह सौ ग्राम कूड़ा का उत्सर्जन माना जाता है। अब यह कूड़ा निकलेगा तो निश्चय ही घर से सड़क पर आयेगा। घर-घरौंदे से बाहर आते ही कूड़ा करकट के डिस्पोजल का उत्तरदायित्व म्यूनिसिपल बोर्ड सरीखे संस्थानों पर आ जाता है। बस यहीं से हम शासन-सत्ता व व्यवस्था को कोसने में लग जाते हैं क्योंकि कूड़ा करकट व गंदगी हमें गली गलियारों से लेकर सड़कों तक फैली दिखती है। 
       म्युनिसिपल बोर्ड हो या लोकल बॉडी सभी की कूड़ा प्रबंधन की एक अलग व्यवस्था होती है। कूड़ा करकट व गंदगी उठाने का हर जगह एक समय निर्धारित होता है। अमूमन-आदतन बाशिंदे घर की साफ-सफाई के बाद कूड़ा सड़क या गली में कूड़ा फेंक देते हैं। लाजिमी है कि यह कूड़ा चौबीस घंटे सड़ता रहेगा। जिससे इलाके में सडांध फैलेगी। एक आदत होती है कि केला या कोई अन्य फल खाया आर उसका छिलका सड़क पर इधर उधर कहीं भी फेंक दिया। खाने-पीने के बाद रैपर या पैकिंग पेपर कहीं भी इधर-उधर फेंक देते हैं। 
         पान-पान मसाला या गुटखा खाया आर कहीं भी थूंक दिया। इससे चौतरफा गंदगी फैलना स्वाभाविक है। इससे सरकारी दफ्तर भी अछूते नहीं रहते। साफ-सफाई के लिए आवश्यक है कि हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा कि हम खुद साफ सफाई का ख्याल रखें। कहीं भी इधर-उधर गंदगी करने या फैलाने से बचना चाहिए। 
      दक्षिण भारत के शहरों में गंदगी कम दिखेगी क्योंकि व्यवस्था के साथ-साथ आदतन साफ सफाई की इच्छाशक्ति होती है। खान-पान-परिधान में विदेश की नकल करते हैं तो सिविक सेंस की भी नकल करनी चाहिए। न्यूयार्क की प्रवासी भारतीय सुश्री कृष्णा कोठारी हिन्दुस्तान आती थीं तो गंदगी के कारण अक्सर बीमार पड़ जाती थीं लिहाजा कोठारी ने साफ सफाई का वीणा उठाया आर 'क्लीन इंदौर" का स्लोगन देकर 'स्वीपिंग-क्लीनिंग-मूवमेंट" चलाना शुरू किया। 
      इसके तहत कृष्णा ने स्कूल-कालेज के छात्र-छात्राओं को चुना। प्रवासी भारतीय कृष्णा छात्र-छात्राओं को एक वीडियो के जरिये गंदगी के नुकसान व साफ-सफाई के फायदे बताती-गिनाती है। इसके लिए उसने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का भी सहारा लिया। परिणाम यह रहा कि कुछ ही समय में 'क्लीन इंदौर" की जमीनी हकीकत दिखने लगी। उपदेश देने या 'स्वीपिंग-क्लीनिंग" की वर्कशाप करने से गली-मोहल्लों को साफ-सुथरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए सिविक सेंस व इच्छाशक्ति होनी चाहिए। खुद को बदलेंगे तो घर-आंगन, गली-मोहल्ला,गांव-गिरांव व मेगासिटीज चमकने लगेंगे।

     

Sunday, 6 August 2017

समाज चिंतन करे, महिला हिंसा कैसे थमे

       महिलाओं-बालिकाओं के साथ आखिर हिंसा क्यों...? यह सवाल सहज मन-मस्तिष्क में उठना स्वाभाविक है। बात चाहे तेजाबी हमलों की हो या बालिकाओं के साथ दुराचार की हो या फिर मानसिक उत्पीड़न की हो। एक सभ्य समाज में चिंता-चिंतन-विमर्श होना लाजिमी है। 

    सवाल उठता है कि आखिर यह सब रुक क्यों नहीं सकता। बालिकाओं-महिलाओं के साथ हिंसा कहीं न कहीं खुद को व्यथित-चिंतित अवश्य करती है क्योंकि हम भी तो किसी बेटी के पिता या किसी बहन के भाई होते हैं।
       बेटी की शादी में पिता अपनी इच्छाशक्ति व आर्थिक सामर्थ को ध्यान में रख कर बहुत कुछ दान-दहेज में देता है लेकिन सामने खड़े व्यक्ति की अपेक्षाएं कहीं अधिक बढ़ जाती हैं आैर विवशता का फायदा उठाने की कोशिश होती है तो पिता की अंतरआत्मा कचोटने लगती है, बस यहीं पर 'बेटियां अभिशाप" लगने लगती हैं क्योंकि अंदर ही अंदर एक भय भी सताने लगता है कि अपेक्षाएं पूरी न की गयीं तो बेटी का उत्पीड़न होगा।
       उच्चतम न्यायालय से लेकर सरपंच की चौपालों तक बालिका-महिला हिंसा के प्रसंग उठते-सामने आते हैं। न्यायापालिका सख्ती भी करती है आैर सरपंच फैसले भी सुनाते-लेते हैं। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि बालिकाओं-महिलाओं को उनके अपने ही घरों में एक संशय घेरे रहता है। कई बार बालिकाओं-महिलाओं का सौन्दर्य भी उनके लिए एक अघोषित दुश्मन हो जाता है। यह सौन्दर्य ही उनके सर्वाधिक असुरक्षित होने का कारण बन जाता है। 
       बालिकाओं-महिलाओं पर तेजाबी हमलों पर गौर करें तो पायेंगे कि अमुक युवक या व्यक्ति किसी युवती को हासिल करना चाहता था लेकिन विफल होने पर उसने तेजाब का हमला कर दिया। आंकड़ों के फलसफे को देखेंगे तो पायेंगे कि अधिकतर मामलों में हासिल करने में विफल रहने पर बालिका-महिला पर तेजाब का हमला किया गया। फलस्वरूप बालिका-महिला के सौन्दर्य की आभा या रंगत बदल चुकी होती है। 
     अब उसे भले ही जुर्माने के तौर पर बड़ी धनराशि मिल जाये आैर दोषी को कड़ी से कड़ी सजा हो जाये लेकिन भुक्तभोगी बालिका-महिला के अन्त:र्मन को कैसे समझा पायेंगे....? सौन्दर्य की क्षतिपूर्ति क्या इतना आसान है.... ? भले ही प्लास्टिक सर्जरी से सौन्दर्य की पूर्ववत आभा लाने की कोशिश की जाये तो क्या तेजाबी हमले की टीस को बालिका-महिला इतनी आसानी से भूल सकती है।
       महिला हिंसा-उत्पीड़न की रोकथाम के लिए कानून भी बनने चाहिए आैर उनका सख्ती से पालन भी होना चाहिए लेकिन एक सभ्य समाज को भी तो अपने उत्तरदायित्व समझने चाहिए। भारतीय संस्कृति व सभ्यता कहीं नहीं कहती कि बालिकाओं-महिलाओं के साथ हिंसा हो या हिंसा करो। फिर हम क्यों भारतीय संस्कृति व सभ्यता की दुहाई देते हैं। हमें अपने आचरण, सोच, चिंतन-विमर्श में सकारात्मक बदलाव लाना चाहिए। 
       गुलाब के फूल का सौन्दर्य व लालित्य आकर्षक व लुभावना होता है लेकिन उसके साथ छेड़छाड़ करते ही उसकी पंखुड़ियां बिखर जाती है। बाल विवाह की रोकथाम के लिए कानून बना तो दो साल की सजा व एक लाख जुर्माना का प्रावधान किया गया लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र सहित देश के तमाम राज्यों में बाल विवाह को नहीं रोका जा सका। 
         कारण देश की व्यवस्था ने कानून तो बना दिये लेकिन समाज का मानसिक बदलाव नहीं कर सके। समाज की मनोवृत्ति को बदले बिना कानून को लागू करना आसान नहीं होता। बात चाहे तेजाबी हमले की हो या फिर बाल विवाह, जबरन विवाह, घरेलू हिंसा या फिर आर्थिक भेदभाव की हो, समाज को अपनी सोच तो बदलना ही होगा।
         विशेषज्ञों की मानें तो कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दुष्कर्म तक के मामलों को देखें तो पायेंगे कि देश में दस करोड़ से अधिक घटनाएं हर साल होती हैं। अब इसमें कोई पीड़िता कानून तक पहंुच पाती है या नहीं। इसका कहीं कोई लेखा जोखा नहीं है। इसमें बालिकाओं-महिलाओं की तस्करी भी शामिल है। बालिकाओं-महिलाओं की तस्करी के लिए गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ापन एक बड़ा कारण है। 
      बालिकाओं व महिलाओं का एक बड़ा तबका कभी धोखाधड़ी तो कभी भूख मिटाने की विवशता उनको वेश्यालयों तक पहंुचा देती है। विशेषज्ञों की मानें तो देश में 2010 में आठ हजार से अधिक बालिकाओं व महिलाओं की खरीद-फरोख्त हुयी। पश्चिम बंगाल बालिकाओं-महिलाओं की खरीद फरोख्त का एक बड़ा केन्द्र माना जाता है। पश्चिम बंगाल से 2009 में 2500 से अधिक बालिकाएं गायब हुयीं। कारण बीस प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है।
        घर-परिवार में महिलाओं को अपेक्षित सम्मान कम ही मिलता है क्योंकि आर्थिक प्रबंध व व्यवस्था कर पुरुष प्रधान समाज खुद को महिलाओं की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ मान लेता है। हालात यह हैं कि देश में पांच करोड़ से अधिक बालिकायें-महिलायें अपने ही घर-परिवार में सुरक्षित नहीं रह पाती आैर हिंसा का शिकार होती हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि देश में ही बालिकाओं व महिलाओं के साथ हिंसा व उनका उत्पीड़न होता है। 
      इस पर गौर करें तो महिला उत्पीड़न से लेकर तस्करी सहित अन्य तमाम मामलों में भारत दुनिया में चौथे स्थान पर है। दुनिया में महिलाओं पर सर्वाधिक उत्पीड़न अफगानिस्तान में होता है। इस मामले में अफगानिस्तान दुनिया में पहले नम्बर पर है। इसी तरह से पाकिस्तान दूसरे व सोमालिया पांचवे स्थान पर है। पडोसी देश चीन को देखे तो ऐसा नहीं है कि महिलाओं-बालिकाओं का उत्पीड़न नहीं होता। 
     चीन में वर्ष 2011 में बालिकाओं-महिलाओं की तस्करी के अपराध में 3196 पकड़े गये। धरपकड़ में 8660 बच्चों व 15458 महिलाओं को मुक्त कराया गया। कहने का आशय है कि कानून बने तो सख्ती से पालन भी हो। 
        महिला मंच की अध्यक्ष व सखी केन्द्र की महामंत्री श्रीमती नीलम चतुर्वेदी का कहना है कि बालिकाओं व महिलाओं को हिंसात्मक हमलों से बचाने के लिए समाज को पितृ सत्ता की सोच को बदलना होगा। महिलाओं को उपभोग की वस्तु नहीं समझा जाना चाहिए। महिलाओं के मामले में समाज को उपभोक्तावादी संस्कृति से हट कर सोचना चाहिए। इसके साथ ही एक सांस्कृतिक क्रांति की जरुरत है। इसके बिना महिलाओं को एक उन्मुक्त वातावरण नहीं दिया जा सकता।

बनारस सिल्क को रेशमी वस्त्र एवं अन्य उत्पाद श्रेणी में प्रथम पुरस्कार मिला    वाराणसी. राज्य निर्यात पुरस्कार योजना वर्ष 2017-18 के अंतर...