Tuesday, 25 July 2017

राष्‍ट्रीय संग्रहालय में भारत की परम्‍परागत पगडि़यां

        संस्‍कृति एवं पर्यटन मंत्रालय में सचिव श्रीमती रश्मि वर्मा ने राष्‍ट्रीय संग्रहालय में ‘भारत की परम्‍परागत पगडि़यां’’ प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। राष्‍ट्रीय संग्रहालय परिसर, जनपथ, नई दिल्‍ली में आयोजित इस लघु प्रदर्शनी में प्रिंटेड पगड़ी, कढ़ाईदार दोपल्‍ली और सिली हुई मराठा टोपी तथा जरदोजी टोपी का प्रदर्शन किया गया। 

       भारतीय परंपरागत पोशाक सहित पगड़ी, पग, टर्बन, टोपी, कैप, हेडगेयर पुरूषों के साथ-साथ अक्‍सर महिलाओं की भी की रोजमर्रा की वेशभूषा का अंग रहे हैं। इन्‍हें अवसर तथा रस्‍म के अनुसार विशेष रूप से डिजाइन किया जाता रहा है। ये पगड़ी या टोपी इन्‍हें धारण करने वाले व्‍यक्ति की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्थिति को सूचित करते हैं। मलमल, सूती, रेशमी, और ऊनी कपड़ों से लेकर तरह-तरह के कपड़ों का इस्‍तेमाल बेहद सजावटी और बारीकी से सजाई गई पगडि़यों या टोपियों में किया जाता था और आगे चलकर इन्‍हें सजाने के लिए रत्‍नों का भी इस्‍तेमाल होने लगा। 
         भारतीय इतिहास का प्रथम चरण पग पहनने के कुछ विशिष्‍ट या खास अंदाज दर्शाता है। मिसाल के तौर पर मौर्य, शुंग काल में दो अवस्‍थाओं में पग बांधने के प्रमाण मिलते है। पहले बालों के जूड़े को ढ़कने वाली टॉप-नॉट लगाई जाती थी और उसके बाद सिर को ढका जाता था। 
       मध्‍यकाल में कई दिलचस्‍प तरह की पगडि़यां देखने को मिलती हैं। मिसाल के तौर पर अकबर की ‘अटपटी पगड़ी’ और शाहजहां की ‘टर्बन बंद’ प्रसिद्ध थीं। समझा जाता है कि औरंगजेब अपनी टोपी खुद बनाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ‘चौगनी’ या ‘चौगोशिया’ टोपी पहनता था, जिसमें चार उठे हुए किनारे होते थे।
           19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के आरंभ में उत्‍तरी क्षेत्र में ‘दो-पल्‍ली’ या ‘गोल टोपी’ या ‘टोपी’ रोजमर्रा के इस्‍तेमाल के साथ ही साथ विशेष अवसरों पर भी पहनी जाती थी। हैदराबाद के निजाम ने ‘दस्‍तार’ की शुरूआत की, जो देखने में सिली हुई टोपी जैसी ही दिखती थी। 
         इतिहास के इस काल के दौरान मंत्री का दर्जा, विशेषकर दरबारी मामलों में, उसकी दस्‍तार के रंग से ही तय होता था। प्रसिद्ध मराठा पगडि़यों और राजपूत पगडि़यों की खास पहचान उनमें इस्‍तेमाल किया गया कपड़ा, रंग, डिजाइन और सजावट हुआ करती थी।

Friday, 21 July 2017

भारत की आर्थिक क्रांति, उपभोक्ता को किंग बनाने की कोशिश

         एक भारत-एक कर यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्सेज (जीएसटी)। इसको दूसरी आर्थिक क्रांति कहा जा रहा है। जीएसटी की व्यवस्था को स्थिर करने का काम जारी है। 

         इसके जरिए हम नव विकासवाद की ऊंचाईयों का स्पर्श करने जा रहे हैं। कर वसूली की सुदृढ व्यवस्था करने का एक मकसद उपभोक्ता को किंग बनाना भी है। इस दिशा में चरणबद्ध तरीके से काम हो रहा है। उपभोक्ता खुद को तब ही किंग यानी सहुलियत वाली अवस्था में महसूस करेगा जब सरकार उचित, सटीक और मानक मापतौल वाला सामान मिलने की व्यवस्था सुनिश्चित करेगी। केंद्र सरकार का यह प्रयास पहली जनवरी 2018 तक पूरी तरह से लागू हो जाएगा। 
         इसमें ठोस प्रावधान होंगे कि मिलावटखोर की खैर न मन पाए। ई कॉमर्स के जरिए समान की डिलेवरी को लेकर धोखाधड़ी बंद हो जए। एक उत्पाद का हर जगह एक ही एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस हो। विज्ञापनों के जरिए उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाने वाले सहम जाएं। 
         केंद्रीय उपभोक्ता, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने लोकसभा में इस आशय की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि सरकार भ्रामक विज्ञापनों पर कड़ी सजा का प्रावधान वाला एक नया उपभोक्ता संरक्षण कानून लाएगी। इसके लिए संसद की स्थायी समिति ने उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2015 के विभिन्न संशोधनों का सुझाव दिया गया है। 
        सरकार उन्हें नए विधेयक में शामिल करेगी। किसी अर्थव्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए उपभोक्ता के संरक्षण का दायित्व सरकार पर है। विकसित यूरोपीय जगत और अमेरिका में उपभोक्ताओं के संरक्षण की कई किवदंतियां अक्सर सुनने को मिलती हैं। तब हठात् अहसास होता है कि काश हमारे यहां भी उपभोक्ताओं के संरक्षण का विधान कठोर कानूनी पैबंद वाले होते। 
        पूरा मामला सिर्फ जागो ग्राहक जागो के विज्ञापन तक सीमित होने के बजाय व्यवहारिक बन पाता। विकसित जगत के बाजार का असली मालिक उपभोक्ता ही है। अपने यहां भी ऐसी मजबूत व्यवस्था हर कोई चाहता है। इसके लिए हमारी व्यवस्था में बदलाव की दलील लंबे समय से दी जा रही थी। अब लगता है कि इस मामले में सरकार ने गंभीर प्रयास शुरु कर दिए है।
            एनडीए की सरकार आने के बाद उपभोक्ता संरक्षण के लिए किए प्रयास के नतीजे अब धरातल पर दिखने लगे हैं। बड़ी संख्या में झूठे और भ्रामक विज्ञापन आने की बात पकड़ में आते ही सरकार सक्रिय है। भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के लिए लंबे समय से सख्त नियम बनाने की बात तो होती रही है। कानूनी मेट्रोलॉजी (पैकेज वस्तुओं) नियम 2011 को प्रभावी करने का काम बल है। 
           यह नया उपभोक्ता संरक्षण कानून की मजबूत पृष्टभूमि तैयार करता है, जिसके तहत भ्रामक विज्ञापन देने वालों को सख्त सजा का प्रावधान होगा। कंपनी अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए प्रचार करती है। लेकिन विज्ञापन और उत्पाद के गुणवत्ता का तारतम्य बैठाना अक्सर मुश्किल होता है। विज्ञापनों को गुमराह करने वाला पाए जाने की बात आम है। 
          इसे उपभोक्ता के विश्वास के प्रति धोखे का मामला मानने की कानूनी व्यस्था हो रही है। धोखेबाजों के लिए भारतीय दंड संहिता में जो प्रावधान हैं, उसमें उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचाने वाले विज्ञापनदाता और विज्ञापन करने वाले सिलेब्रेटी दोनों के खिलाफ कानून आयद किया जा रहा है। हमारे समाज में जागरूकता की व्यापक कमी के चलते ज्यादातर लोग वस्तुओं की उपयोगिता को विज्ञापनों में किए गए दावों के मुताबिक मान लेते हैं और उसकी हकीकत के बारे में पड़ताल नहीं करते। जबकि किसी भी उपभोक्ता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह उत्पाद के विज्ञापन में दावा किए गए गुणवता के जांच की मांग करे। 
          ऐसा नहीं पाए जाने पर उसके खिलाफ शिकायत का अधिकार रखे। वस्तुओं के विज्ञापन में किए गए दावों की वास्तविकता की जांच परख की कोई कसौटी नहीं थी और न इन पर कारगर तरीके से रोक लगाने के लिए कोई तंत्र था। अब सरकार ने इस तंत्र को सक्रिय करने का फैसला लिया है। नए दिशा-निर्देश में किसी वस्तु के गुण-दोषों का ब्योरा न देकर भ्रमित करने वाली जानकारियां देते अखबार, टीवी या एसएमएस के जरिए परोसे जाने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाने का प्रावधान है।
           केंद्रीय उपभोक्ता, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान ने भ्रामक विज्ञापनों पर लगाम लगाने के लिए कड़ी सजा वाला कानून लाने की बात लोकसभा में कही है और इस तरह का कानून बनाकर मंत्रिमंडल के समक्ष रखने तक का दावा किया है। इससे उम्मीद बंधी है कि सरकार अपने वादे पर खरा उतरेगी और भ्रामक विज्ञापनों के जरिए आम उपभोक्ता को गुमराह करने वाली कार्रवाई पर अंकुश लग सकेगा। 
           सरकार का दायित्व है कि वह उपभोक्ता में भरोसा पैदा करे कि वह घटिया माल के खिलाफ उपभोक्ता अदालत की शरण में जाए। शिकायत कर पाए। कानूनी प्रावधान है कि उपभोक्तताओं की पंजीकृत स्वयंसेवी संस्थाएं शिकायत कर सकती हैं।केंद्र सरकार शिकायत कर सकती है । राज्य सरकार शिकायत कर सकती है।समान हित वाले उपभोक्ता-समूह की ओर से एक अथवा अनेक उपभोक्ता शिकायत कर सकते हैं। नए नियम का प्रचार प्रसार जारी है। नतीजे क्रमबद्ध तरीके से सामने आने लगे हैं। 
          एयरपोर्ट,सिनेमा हॉल, आम बाजार और मॉल्स में बेचे जाने वाले एक ही सामान पर अलग अलग एमआरपी का रैपर लगा होता था। अब तस्दीक की जा रही है कि एक सामान का एक ही एमआरपी हो। उपभोक्ताओं के लिए सामानों का ई-कोडिंग अनिवार्य किया जा रहा है ताकि मात्रा के चेकिंग को सांइटिफिट हो। इसी तरह सामान के संमिश्रण को रैपर पर बड़े अक्षरों में साफ साफ अंकित करने के नियम को कठोरता से लागू करने की बात हो रही है। 
             उपभोक्ता संरक्षण कानून अधिनियम 1986 देश भर में लागू है। तब से इसके जरिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों को उपभोक्ताओं के संरक्षण में खड़े होने का हक मिला हुआ है। इसमें उपभोक्ता के अधिकार तौर पर उल्लेखित है कि उपभोक्ता जीवन एवं संपत्ति के लिए घातक पदार्थों  या सेवाओं की बिक्री से बचाव का अधिकार रखेगा। उपभोक्ता पदार्थों एवं सेवाओं का मूल्य, उनका स्तर, गुणवत्ता, शुद्धता, मात्रा व प्रभाव के संबंध में सूचना पाने का अधिकार है। जहां भी संभव हो, प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर उपभोक्ता पदर्थों एवं सेवाओं की उपलब्धि के भरोसे का अधिकार है। अपने पक्ष की सुनवाई का अधिकार के साथ सभी उपयुक्त मंचों पर उपभोक्त हितों को ध्यान में रखे जाने का आश्वासन मिला हुआ है। 
           अनुचति व्यापार प्रक्रिया अथवा अनियंत्रित उपभोक्ता शोषण से संबंधित शिकायत की सुनवाई का अधिकार है। इसके लिए उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार है। उपभोक्ता संरक्षण कानून ज्यादातर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होता है। निजी, सरकारी और सहकारी सभी क्षेत्र के उत्पादों को इस कानून के अंतर्गत रखा गया हैं। जब किसी उपभोक्ता को लगे कि वस्तु या सेवा में कोई अनुचित या खराब है, जिसके कारण उसे हानि पहुंचती है। तब वह इस कानून का प्रयोग कर उचित उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। 
               केंद्रीय मंत्री पासवान कहते हैं कि इस व्यवस्था को जितना प्रचारित किया जाना चाहिए था वो नहीं हो सका। अगर ऐसा हुआ होता, तो भारतीय बाजार की धाक बेमिसाल होता। सबसे ज्यादा मुश्किल जीवन रक्षक मेडिकल व्यवस्था से जुड़े उत्पादों पर होता रहा है। ज्यादा कीमत वसूलने के लिए कई नुस्खे विकसित कर लिए गए थे। उन सबकी पहचान कर मंत्रालय ने नियम के जरिए उपभोक्ताओं की सहुलियत का ख्याल किया है। 
          इसका असर बाजार पर दिखने लगा है। स्टंट, सिरिंच,वाल्व आदि की कीमतें कम हुई हैं। कम कीमत वाली दवाओं की उपलब्धता को आम किया जा रहा है। नए नियम के लागू होने से उपभोक्ताओं को पूरी तरह से उपभोक्ता अदालत के भरोसे छोड़ने के बजाए सरकार ने ढेरों का अपने हाथ में लेने की पहल की है। 
             यह पहली बार दिख रहा है कि मौजूदा शासन व्यवस्था में अदालत में जाकर क्लेम कर राहत पाने वाले चुनिंदा लोगों पर फोकस करने की प्रवृति का परित्याग किया गया है। केंद्र सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत पहुचने का काम खुद के हाथ में लेकर कानून प्रभावी करने वाली एजेंसियों को सक्रिय करने की ठान ली है।

Tuesday, 18 July 2017

दिल दिमाग फिट तो बल्ले-बल्ले

         'दिल" व 'दिमाग" हमेशा चुस्त-दुरुस्त रहे तो फिर जिन्दगी के क्या कहने। चौतरफा-चहुंओर बल्ले-बल्ले ही रहेगी क्योंकि 'दिल" व 'दिमाग" जिन्दगी की रफ्तार को निश्चय ही पंख लगा देते हैं। 

       'दिल" व 'दिमाग" स्वस्थ्य तो जिन्दगी में कहीं कोई अड़चन-परेशानी आ ही नहीं सकती। जी हां, तरोताजा रहेंगे तो जिन्दगी का हर पल प्रफुल्लता से लबरेज रहेगा। इससे न केवल आत्म विश्वास बढ़ता है बल्कि कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है। 
         पुरातन-सनातन व्यवस्थाओं में शायद इसी लिए गीत-संगीत को खास तौर से महत्व दिया गया। गीत-संगीत व्यक्ति में खास-विशेष उर्जा का संचार करता है। विशेषज्ञों की मानें तो संगीत की स्वर लहरियां शरीर में एक खास हलचल पैदा करती हैं जिससे शरीर की समस्त मांसपेशियां क्रियाशील हो जाती हैं।
      विशेषज्ञों की मानें तो गायन-वादन-श्रवण से सभी से व्यक्तित्व में एक खास निखार आता है। संगीत का वादन करने वाला हो या उसकी कर्णप्रियता का आनन्द लेने वाला हो, संगीत से शरीर में विभिन्न प्रकार के 'हार्मोन्स" का रुााव होता है। इन हार्मोंन्स का प्रभाव शरीर के विभिन्न अंगों पर पड़ता है। 

        मसलन 'डोपामीन" हार्मोन से व्यक्ति को प्रेरणा मिलती है तो 'एण्ड्राफीन" हार्मोन से व्यक्ति में प्रसन्नता-खुशी प्रस्फुटित होती है। संगीत के वादन-श्रवण से शरीर में 'डोपामीन" व 'एण्ड्राफीन" जैसे अनेक रुााव होते हैं। शरीर में इन हार्मोन के रुााव से व्यक्ति में आत्म विश्वास जागृत होता है जिससे सुरक्षा का एहसास बढ़ता है। 
         संगीत व्यक्ति में रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि करता है। शरीर तनाव से मुक्त रहता है। संगीत से शरीर का सम्पूर्ण स्नायु तंत्र क्रियाशील रहता है। विशेषज्ञों की मानें तो पियानो बजाने से एक तो संगीत की स्वर लहरियां मन-मस्तिष्क को झंकृत करती हैं तो वहीं वादन करने वाले की शारीरिक एक्सरसाइज भी होती है। 
      इसी तरह से सैक्सोफोन बजाने वाले व्यक्ति का श्वांस तंत्र व मांसपेशियां क्रियाशील होती हैं। सैक्सोफोन का वादन खास तौर से अस्थमा के मरीजों को लाभ-आराम देता है। व्यक्ति के स्नायु तंत्र क्रियाशील होंगे तो याददाश्त भी ठीक-ठाक एवं चुस्त-दुरुस्त रहेगी। 
        याददाश्त ठीक-ठाक तो कार्य क्षमता में वृद्धि होना लाजिमी है। इसका सीधा व पूर्ण प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व से लेकर जीवन पर पड़ता है। संगीत व्यक्ति को हमेशा चैतन्यता से लबरेज रखता है।
        काम-काज की भाग-दौड़ व दफ्तर के तनाव से राहत पाने के लिए आवश्यक है कि संगीत व एक्सरसाइज जिन्दगी का हिस्सा बने। 
       अमेरिकी रोग नियंत्रण केन्द्र की सिफारिश है कि सप्ताह में कम से कम एक सौ पचास मिनट एरोबिक अभ्यास अवश्य होना चाहिए क्योंकि इससे शरीर (बॉडी) एकदम फिट रहेगी। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि तनाव से मुक्त रहने के लिए स्वीमिंग भी करनी चाहिए क्योंकि जलक्रीडा व्यक्ति को तरोताजा व ताजगी से लबरेज रखती है। 
       इसलिए भले ही जिन्दगी की आपाधापी में अधिक वक्त न निकले लेकिन कुछ वक्त जिन्दगी के लिए अवश्य निकालना चाहिए जिससे जिन्दगी का हर लमहा बल्ले-बल्ले रहे।

Monday, 17 July 2017

बैटरी-इलेक्ट्रिक चलित वाहन को अब सड़क रिचार्ज करेगी

       देश में मंहगाई के तीखे झटके अक्सर गांव-गिरावं से लेकर मेगासिटीज के बाशिंदों को लगते रहते हैं। खास तौर से देखा जाये तो पेट्रोल व डीजल की कीमतों में दो साल में एक दर्जन बार इजाफा हुआ।

    हालांकि इसके बावजूद देश में पेट्रोल व डीजल चलित वाहनों की संख्या में कोई कमी नहीं आयी। पेट्रोल व डीजल की कीमतों में इजाफा होने से वाहनों के संचालक व चालक कुछ तनाव में अवश्य आ जाते हैं। 
         आटोमोबाइल इण्डस्ट्री के इंजीनियर्स ने पेट्रोल व डीजल की खपत से निजात दिलाने के लिए बैटरी-इलेक्ट्रिक चलित वाहनों की श्रंखला इजाद की। देश में बैटरी-इलेक्ट्रिक चलित वाहन सड़कों पर दौड़ने भी लगे। ऐसे वाहन चालकों के सामने एक बड़ी समस्या है कि यदि यात्रा के दौरान बैटरी डिस्चार्ज हो गयी तो समझो एक बड़ी मुसीबत सामने आ गयी। 
          टेक्नॉलॉजी पर भरोसा करें तो भविष्य में इन दिक्कतों से वाहन चालकों को छुटकारा मिल सकेगा। दक्षिण कोरिया के इंजीनियर्स ने इलेक्ट्रिक टेक्नॉलॉजी से युक्त एक सड़क इजाद की है। दक्षिण कोरिया की यह सड़क उपर से गुजरने वाले वाहनों को रिचार्ज करती है।
        हालांकि इलेक्ट्रिक टेक्नॉलॉजी वाली यह सड़क फिलहाल बारह किलोमीटर लम्बी बनायी गयी है लेकिन भविष्य में इसे अपेक्षित विस्तार दिया जायेगा। इंजीनियर्स मानते हैं कि दक्षिण कोरिया की यह इलेक्ट्रिक सड़क देश-दुनिया की रिचार्ज सिस्टम वाली पहली सड़क है। 
         खास बात यह है कि वाहन को रिचार्र्ज करने के लिए सड़क पर कहीं रुकने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि टेक्नॉलॉजी का सम्पूर्ण सिस्टम सड़क के अन्दर संचालित होता है। फिलहाल अभी इस सड़क पर दो सार्वजनिक बसों का संचालन किया जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो दो वर्ष की अवधि में इस सड़क पर दस आैर बसों को चलाया जायेगा। 
          टेक्नॉलॉजी के इस सिस्टम को कोरिया की कोरिया एडवांस इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एण्ड टेक्नॉलॉजी के विशेषज्ञों ने तैयार किया है। हालांकि यह टेक्नॉलॉजी काफी खर्चीली व महंगी है लेकिन बैटरी-इलेक्ट्रिक चलित वाहन चालकों के लिए बेहद सहूलियत वाली है। इस टेक्नॉलॉजी से वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को काफी हद तक रोका जा सकता है।
       विशेषज्ञों की मानें तो सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में इस टेक्नॉलॉजी की भारी संभावनाएं हैं। इससे जन स्वास्थ्य को भी कोई खतरा नहीं है। इस टेक्नॉलॉजी में बिजली के तारों को सड़क के नीचे सिस्टमेटिक तौर-तरीके से लगाया गया है। इसमें उपकरण भी लगाये गये हैं।
        यह सिस्टम विद्युत की चुम्बकीय धारा प्रवाहित करता है। वाहन के चार्ज होने वाले उपकरण को सड़क से कुछ अंतराल पर वाहन में स्थापित किया जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस सिस्टम के लिए पूरी सड़क न तो खोदने की आवश्यकता है आैर न पूरी सड़क में सिस्टम को लगाया जाता है।
        सिस्टम की पॉवर स्ट्रिप को सड़क के पांच से पन्द्रह प्रतिशत हिस्से में ही लगाया जाता है। हालांकि दक्षिण कोरिया की इस टेक्नॉलॉजी से पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता भी कम होगी तो वहीं वायु प्रदूषण भी कम होगा। वाहन चालकों को तो सहूलियत रहेगी ही। 
       इतना जरुर है कि इस टेक्नॉलॉजी से युक्त सड़कों के रखरखाव पर खास-विशेष ध्यान रखना पड़ेगा जिससे वाहन स्मूथली अपनी रफ्तार को कायम रख सकें। फिलहाल दक्षिण कोरिया के सार्वजनिक वाहन चालकों के लिए एक बड़ी खुशखबरी तो है ही। हालांकि इस टेक्नॉलॉजी को अपनाने में देश-दुनिया को अभी लम्बा वक्त लगेगा।

Sunday, 16 July 2017

उपभोक्‍ता सं‍तुष्टि में रायपुर हवाई अड्डा पहले पायदान पर

         देश के 49 हवाई अड्डों में रायपुर के स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डे को एक बार फिर से उपभोक्‍ता संतुष्टि में प्रथम स्थान प्राप्‍त हुआ है। 

     जनवरी से जून 2017 की अवधि के दौरान एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा किए गए नवीनतम सीएसआई सर्वेक्षण में रायपुर हवाई अड्डे ने पांच अंकों के पैमाने पर 4.84 अंक हासिल किए हैं। इसके बाद उदयपुर, अमृतसर और देहरादून हवाई अड्डों का स्‍थान है, जिन्‍होंने क्रमशः 4.75, 4.74 और 4.73 अंक हासिल किए हैं।
       भारतीय विमानपत्‍तन प्राधिकरण (एएआई) अपने हवाई अड्डों पर यात्री सुविधाओं व सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास करता है। इस कारण यह दुनिया के सर्वोत्तम सेवा प्रदाताओं में से एक है। 
         उपभोक्‍ता संतुष्टि, एएआई के प्रमुख प्रदर्शन उद्देश्यों में से एक है। उपभोक्‍ता संतुष्टि का मूल्‍यांकन एक स्‍वतंत्र एजेंसी करती है, जिसका गठन स्‍वयं एएआई करता है। इस सर्वे में परिवहन, पार्किंग, यात्री सुविधाओं और स्‍वच्‍छता जैसे कई मानदंडों को शामिल किया जाता है।
        रायपुर के एकीकृत टर्मिनल भवन का उद्घाटन 2012 में हुआ था। आधारभूत संरचना व यात्री सुविधाओं का उच्च स्तरीय रखरखाव, प्राकृतिक वातावरण, उच्‍चस्‍तरीय तकनीक का प्रयोग और विनम्र कर्मचारियों की सहायता से रायपुर को पिछले दो वर्षों में लगातार तीसरी बार मान्यता प्राप्त हुई है।

Thursday, 13 July 2017

देश के 91 प्रमुख जलाशयों के जल में 2 प्रतिशत वृद्धि

       देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 36.108 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत है। सप्ताह के अंत के दौरान 21 प्रतिशत था। 13 जुलाई, 2017 का जलस्तर पिछले वर्ष की इसी अवधि के भंडारण का 85 प्रतिशत था तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 82 प्रतिशत है। 

       इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं, जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं। 
          उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 6.12 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 34 प्रतिशत है।
          पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 28 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 37 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है, लेकिन पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से यह कमतर है।
         पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 3.62 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 19 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 22 प्रतिशत थी। 
        पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 22 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कमतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है। 
        पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 7.07 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 26 प्रतिशत है। 
       पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 19 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 28 प्रतिशत थी। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है लेकिन यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से कमतर है।
         मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 12.09 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत है।
         पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 42 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 25 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है लेकिन यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 
       दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 7.21 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 14 प्रतिशत है। 
        पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 20 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत था। 
      इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है, और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है।
        पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें हिमाचल प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना शामिल हैं। 
        पिछले साल की इसी अवधि के समान संग्रहण करने वाले राज्यों में महाराष्ट्र शामिल है, पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में कम संग्रहण करने वाले राज्यों में राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और एपी एवं टीजी (दो राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं।

बनारस सिल्क को रेशमी वस्त्र एवं अन्य उत्पाद श्रेणी में प्रथम पुरस्कार मिला    वाराणसी. राज्य निर्यात पुरस्कार योजना वर्ष 2017-18 के अंतर...