भारत की आर्थिक क्रांति, उपभोक्ता को किंग बनाने की कोशिश
एक भारत-एक कर यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्सेज (जीएसटी)। इसको दूसरी आर्थिक क्रांति कहा जा रहा है। जीएसटी की व्यवस्था को स्थिर करने का काम जारी है।
इसके जरिए हम नव विकासवाद की ऊंचाईयों का स्पर्श करने जा रहे हैं। कर वसूली की सुदृढ व्यवस्था करने का एक मकसद उपभोक्ता को किंग बनाना भी है। इस दिशा में चरणबद्ध तरीके से काम हो रहा है। उपभोक्ता खुद को तब ही किंग यानी सहुलियत वाली अवस्था में महसूस करेगा जब सरकार उचित, सटीक और मानक मापतौल वाला सामान मिलने की व्यवस्था सुनिश्चित करेगी। केंद्र सरकार का यह प्रयास पहली जनवरी 2018 तक पूरी तरह से लागू हो जाएगा।
इसमें ठोस प्रावधान होंगे कि मिलावटखोर की खैर न मन पाए। ई कॉमर्स के जरिए समान की डिलेवरी को लेकर धोखाधड़ी बंद हो जए। एक उत्पाद का हर जगह एक ही एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस हो। विज्ञापनों के जरिए उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाने वाले सहम जाएं।
केंद्रीय उपभोक्ता, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने लोकसभा में इस आशय की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि सरकार भ्रामक विज्ञापनों पर कड़ी सजा का प्रावधान वाला एक नया उपभोक्ता संरक्षण कानून लाएगी। इसके लिए संसद की स्थायी समिति ने उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2015 के विभिन्न संशोधनों का सुझाव दिया गया है।
सरकार उन्हें नए विधेयक में शामिल करेगी। किसी अर्थव्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए उपभोक्ता के संरक्षण का दायित्व सरकार पर है। विकसित यूरोपीय जगत और अमेरिका में उपभोक्ताओं के संरक्षण की कई किवदंतियां अक्सर सुनने को मिलती हैं। तब हठात् अहसास होता है कि काश हमारे यहां भी उपभोक्ताओं के संरक्षण का विधान कठोर कानूनी पैबंद वाले होते।
पूरा मामला सिर्फ जागो ग्राहक जागो के विज्ञापन तक सीमित होने के बजाय व्यवहारिक बन पाता। विकसित जगत के बाजार का असली मालिक उपभोक्ता ही है। अपने यहां भी ऐसी मजबूत व्यवस्था हर कोई चाहता है। इसके लिए हमारी व्यवस्था में बदलाव की दलील लंबे समय से दी जा रही थी। अब लगता है कि इस मामले में सरकार ने गंभीर प्रयास शुरु कर दिए है।
एनडीए की सरकार आने के बाद उपभोक्ता संरक्षण के लिए किए प्रयास के नतीजे अब धरातल पर दिखने लगे हैं। बड़ी संख्या में झूठे और भ्रामक विज्ञापन आने की बात पकड़ में आते ही सरकार सक्रिय है। भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के लिए लंबे समय से सख्त नियम बनाने की बात तो होती रही है। कानूनी मेट्रोलॉजी (पैकेज वस्तुओं) नियम 2011 को प्रभावी करने का काम बल है।
यह नया उपभोक्ता संरक्षण कानून की मजबूत पृष्टभूमि तैयार करता है, जिसके तहत भ्रामक विज्ञापन देने वालों को सख्त सजा का प्रावधान होगा। कंपनी अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए प्रचार करती है। लेकिन विज्ञापन और उत्पाद के गुणवत्ता का तारतम्य बैठाना अक्सर मुश्किल होता है। विज्ञापनों को गुमराह करने वाला पाए जाने की बात आम है।
इसे उपभोक्ता के विश्वास के प्रति धोखे का मामला मानने की कानूनी व्यस्था हो रही है। धोखेबाजों के लिए भारतीय दंड संहिता में जो प्रावधान हैं, उसमें उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचाने वाले विज्ञापनदाता और विज्ञापन करने वाले सिलेब्रेटी दोनों के खिलाफ कानून आयद किया जा रहा है। हमारे समाज में जागरूकता की व्यापक कमी के चलते ज्यादातर लोग वस्तुओं की उपयोगिता को विज्ञापनों में किए गए दावों के मुताबिक मान लेते हैं और उसकी हकीकत के बारे में पड़ताल नहीं करते। जबकि किसी भी उपभोक्ता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह उत्पाद के विज्ञापन में दावा किए गए गुणवता के जांच की मांग करे।
ऐसा नहीं पाए जाने पर उसके खिलाफ शिकायत का अधिकार रखे। वस्तुओं के विज्ञापन में किए गए दावों की वास्तविकता की जांच परख की कोई कसौटी नहीं थी और न इन पर कारगर तरीके से रोक लगाने के लिए कोई तंत्र था। अब सरकार ने इस तंत्र को सक्रिय करने का फैसला लिया है। नए दिशा-निर्देश में किसी वस्तु के गुण-दोषों का ब्योरा न देकर भ्रमित करने वाली जानकारियां देते अखबार, टीवी या एसएमएस के जरिए परोसे जाने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाने का प्रावधान है।
केंद्रीय उपभोक्ता, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान ने भ्रामक विज्ञापनों पर लगाम लगाने के लिए कड़ी सजा वाला कानून लाने की बात लोकसभा में कही है और इस तरह का कानून बनाकर मंत्रिमंडल के समक्ष रखने तक का दावा किया है। इससे उम्मीद बंधी है कि सरकार अपने वादे पर खरा उतरेगी और भ्रामक विज्ञापनों के जरिए आम उपभोक्ता को गुमराह करने वाली कार्रवाई पर अंकुश लग सकेगा।
सरकार का दायित्व है कि वह उपभोक्ता में भरोसा पैदा करे कि वह घटिया माल के खिलाफ उपभोक्ता अदालत की शरण में जाए। शिकायत कर पाए। कानूनी प्रावधान है कि उपभोक्तताओं की पंजीकृत स्वयंसेवी संस्थाएं शिकायत कर सकती हैं।केंद्र सरकार शिकायत कर सकती है । राज्य सरकार शिकायत कर सकती है।समान हित वाले उपभोक्ता-समूह की ओर से एक अथवा अनेक उपभोक्ता शिकायत कर सकते हैं। नए नियम का प्रचार प्रसार जारी है। नतीजे क्रमबद्ध तरीके से सामने आने लगे हैं।
एयरपोर्ट,सिनेमा हॉल, आम बाजार और मॉल्स में बेचे जाने वाले एक ही सामान पर अलग अलग एमआरपी का रैपर लगा होता था। अब तस्दीक की जा रही है कि एक सामान का एक ही एमआरपी हो। उपभोक्ताओं के लिए सामानों का ई-कोडिंग अनिवार्य किया जा रहा है ताकि मात्रा के चेकिंग को सांइटिफिट हो। इसी तरह सामान के संमिश्रण को रैपर पर बड़े अक्षरों में साफ साफ अंकित करने के नियम को कठोरता से लागू करने की बात हो रही है।
उपभोक्ता संरक्षण कानून अधिनियम 1986 देश भर में लागू है। तब से इसके जरिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों को उपभोक्ताओं के संरक्षण में खड़े होने का हक मिला हुआ है। इसमें उपभोक्ता के अधिकार तौर पर उल्लेखित है कि उपभोक्ता जीवन एवं संपत्ति के लिए घातक पदार्थों या सेवाओं की बिक्री से बचाव का अधिकार रखेगा। उपभोक्ता पदार्थों एवं सेवाओं का मूल्य, उनका स्तर, गुणवत्ता, शुद्धता, मात्रा व प्रभाव के संबंध में सूचना पाने का अधिकार है। जहां भी संभव हो, प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर उपभोक्ता पदर्थों एवं सेवाओं की उपलब्धि के भरोसे का अधिकार है। अपने पक्ष की सुनवाई का अधिकार के साथ सभी उपयुक्त मंचों पर उपभोक्त हितों को ध्यान में रखे जाने का आश्वासन मिला हुआ है।
अनुचति व्यापार प्रक्रिया अथवा अनियंत्रित उपभोक्ता शोषण से संबंधित शिकायत की सुनवाई का अधिकार है। इसके लिए उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार है। उपभोक्ता संरक्षण कानून ज्यादातर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होता है। निजी, सरकारी और सहकारी सभी क्षेत्र के उत्पादों को इस कानून के अंतर्गत रखा गया हैं। जब किसी उपभोक्ता को लगे कि वस्तु या सेवा में कोई अनुचित या खराब है, जिसके कारण उसे हानि पहुंचती है। तब वह इस कानून का प्रयोग कर उचित उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।
केंद्रीय मंत्री पासवान कहते हैं कि इस व्यवस्था को जितना प्रचारित किया जाना चाहिए था वो नहीं हो सका। अगर ऐसा हुआ होता, तो भारतीय बाजार की धाक बेमिसाल होता। सबसे ज्यादा मुश्किल जीवन रक्षक मेडिकल व्यवस्था से जुड़े उत्पादों पर होता रहा है। ज्यादा कीमत वसूलने के लिए कई नुस्खे विकसित कर लिए गए थे। उन सबकी पहचान कर मंत्रालय ने नियम के जरिए उपभोक्ताओं की सहुलियत का ख्याल किया है।
इसका असर बाजार पर दिखने लगा है। स्टंट, सिरिंच,वाल्व आदि की कीमतें कम हुई हैं। कम कीमत वाली दवाओं की उपलब्धता को आम किया जा रहा है। नए नियम के लागू होने से उपभोक्ताओं को पूरी तरह से उपभोक्ता अदालत के भरोसे छोड़ने के बजाए सरकार ने ढेरों का अपने हाथ में लेने की पहल की है।
यह पहली बार दिख रहा है कि मौजूदा शासन व्यवस्था में अदालत में जाकर क्लेम कर राहत पाने वाले चुनिंदा लोगों पर फोकस करने की प्रवृति का परित्याग किया गया है। केंद्र सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत पहुचने का काम खुद के हाथ में लेकर कानून प्रभावी करने वाली एजेंसियों को सक्रिय करने की ठान ली है।

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