Sunday, 6 August 2017

समाज चिंतन करे, महिला हिंसा कैसे थमे

       महिलाओं-बालिकाओं के साथ आखिर हिंसा क्यों...? यह सवाल सहज मन-मस्तिष्क में उठना स्वाभाविक है। बात चाहे तेजाबी हमलों की हो या बालिकाओं के साथ दुराचार की हो या फिर मानसिक उत्पीड़न की हो। एक सभ्य समाज में चिंता-चिंतन-विमर्श होना लाजिमी है। 

    सवाल उठता है कि आखिर यह सब रुक क्यों नहीं सकता। बालिकाओं-महिलाओं के साथ हिंसा कहीं न कहीं खुद को व्यथित-चिंतित अवश्य करती है क्योंकि हम भी तो किसी बेटी के पिता या किसी बहन के भाई होते हैं।
       बेटी की शादी में पिता अपनी इच्छाशक्ति व आर्थिक सामर्थ को ध्यान में रख कर बहुत कुछ दान-दहेज में देता है लेकिन सामने खड़े व्यक्ति की अपेक्षाएं कहीं अधिक बढ़ जाती हैं आैर विवशता का फायदा उठाने की कोशिश होती है तो पिता की अंतरआत्मा कचोटने लगती है, बस यहीं पर 'बेटियां अभिशाप" लगने लगती हैं क्योंकि अंदर ही अंदर एक भय भी सताने लगता है कि अपेक्षाएं पूरी न की गयीं तो बेटी का उत्पीड़न होगा।
       उच्चतम न्यायालय से लेकर सरपंच की चौपालों तक बालिका-महिला हिंसा के प्रसंग उठते-सामने आते हैं। न्यायापालिका सख्ती भी करती है आैर सरपंच फैसले भी सुनाते-लेते हैं। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि बालिकाओं-महिलाओं को उनके अपने ही घरों में एक संशय घेरे रहता है। कई बार बालिकाओं-महिलाओं का सौन्दर्य भी उनके लिए एक अघोषित दुश्मन हो जाता है। यह सौन्दर्य ही उनके सर्वाधिक असुरक्षित होने का कारण बन जाता है। 
       बालिकाओं-महिलाओं पर तेजाबी हमलों पर गौर करें तो पायेंगे कि अमुक युवक या व्यक्ति किसी युवती को हासिल करना चाहता था लेकिन विफल होने पर उसने तेजाब का हमला कर दिया। आंकड़ों के फलसफे को देखेंगे तो पायेंगे कि अधिकतर मामलों में हासिल करने में विफल रहने पर बालिका-महिला पर तेजाब का हमला किया गया। फलस्वरूप बालिका-महिला के सौन्दर्य की आभा या रंगत बदल चुकी होती है। 
     अब उसे भले ही जुर्माने के तौर पर बड़ी धनराशि मिल जाये आैर दोषी को कड़ी से कड़ी सजा हो जाये लेकिन भुक्तभोगी बालिका-महिला के अन्त:र्मन को कैसे समझा पायेंगे....? सौन्दर्य की क्षतिपूर्ति क्या इतना आसान है.... ? भले ही प्लास्टिक सर्जरी से सौन्दर्य की पूर्ववत आभा लाने की कोशिश की जाये तो क्या तेजाबी हमले की टीस को बालिका-महिला इतनी आसानी से भूल सकती है।
       महिला हिंसा-उत्पीड़न की रोकथाम के लिए कानून भी बनने चाहिए आैर उनका सख्ती से पालन भी होना चाहिए लेकिन एक सभ्य समाज को भी तो अपने उत्तरदायित्व समझने चाहिए। भारतीय संस्कृति व सभ्यता कहीं नहीं कहती कि बालिकाओं-महिलाओं के साथ हिंसा हो या हिंसा करो। फिर हम क्यों भारतीय संस्कृति व सभ्यता की दुहाई देते हैं। हमें अपने आचरण, सोच, चिंतन-विमर्श में सकारात्मक बदलाव लाना चाहिए। 
       गुलाब के फूल का सौन्दर्य व लालित्य आकर्षक व लुभावना होता है लेकिन उसके साथ छेड़छाड़ करते ही उसकी पंखुड़ियां बिखर जाती है। बाल विवाह की रोकथाम के लिए कानून बना तो दो साल की सजा व एक लाख जुर्माना का प्रावधान किया गया लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र सहित देश के तमाम राज्यों में बाल विवाह को नहीं रोका जा सका। 
         कारण देश की व्यवस्था ने कानून तो बना दिये लेकिन समाज का मानसिक बदलाव नहीं कर सके। समाज की मनोवृत्ति को बदले बिना कानून को लागू करना आसान नहीं होता। बात चाहे तेजाबी हमले की हो या फिर बाल विवाह, जबरन विवाह, घरेलू हिंसा या फिर आर्थिक भेदभाव की हो, समाज को अपनी सोच तो बदलना ही होगा।
         विशेषज्ञों की मानें तो कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दुष्कर्म तक के मामलों को देखें तो पायेंगे कि देश में दस करोड़ से अधिक घटनाएं हर साल होती हैं। अब इसमें कोई पीड़िता कानून तक पहंुच पाती है या नहीं। इसका कहीं कोई लेखा जोखा नहीं है। इसमें बालिकाओं-महिलाओं की तस्करी भी शामिल है। बालिकाओं-महिलाओं की तस्करी के लिए गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ापन एक बड़ा कारण है। 
      बालिकाओं व महिलाओं का एक बड़ा तबका कभी धोखाधड़ी तो कभी भूख मिटाने की विवशता उनको वेश्यालयों तक पहंुचा देती है। विशेषज्ञों की मानें तो देश में 2010 में आठ हजार से अधिक बालिकाओं व महिलाओं की खरीद-फरोख्त हुयी। पश्चिम बंगाल बालिकाओं-महिलाओं की खरीद फरोख्त का एक बड़ा केन्द्र माना जाता है। पश्चिम बंगाल से 2009 में 2500 से अधिक बालिकाएं गायब हुयीं। कारण बीस प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है।
        घर-परिवार में महिलाओं को अपेक्षित सम्मान कम ही मिलता है क्योंकि आर्थिक प्रबंध व व्यवस्था कर पुरुष प्रधान समाज खुद को महिलाओं की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ मान लेता है। हालात यह हैं कि देश में पांच करोड़ से अधिक बालिकायें-महिलायें अपने ही घर-परिवार में सुरक्षित नहीं रह पाती आैर हिंसा का शिकार होती हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि देश में ही बालिकाओं व महिलाओं के साथ हिंसा व उनका उत्पीड़न होता है। 
      इस पर गौर करें तो महिला उत्पीड़न से लेकर तस्करी सहित अन्य तमाम मामलों में भारत दुनिया में चौथे स्थान पर है। दुनिया में महिलाओं पर सर्वाधिक उत्पीड़न अफगानिस्तान में होता है। इस मामले में अफगानिस्तान दुनिया में पहले नम्बर पर है। इसी तरह से पाकिस्तान दूसरे व सोमालिया पांचवे स्थान पर है। पडोसी देश चीन को देखे तो ऐसा नहीं है कि महिलाओं-बालिकाओं का उत्पीड़न नहीं होता। 
     चीन में वर्ष 2011 में बालिकाओं-महिलाओं की तस्करी के अपराध में 3196 पकड़े गये। धरपकड़ में 8660 बच्चों व 15458 महिलाओं को मुक्त कराया गया। कहने का आशय है कि कानून बने तो सख्ती से पालन भी हो। 
        महिला मंच की अध्यक्ष व सखी केन्द्र की महामंत्री श्रीमती नीलम चतुर्वेदी का कहना है कि बालिकाओं व महिलाओं को हिंसात्मक हमलों से बचाने के लिए समाज को पितृ सत्ता की सोच को बदलना होगा। महिलाओं को उपभोग की वस्तु नहीं समझा जाना चाहिए। महिलाओं के मामले में समाज को उपभोक्तावादी संस्कृति से हट कर सोचना चाहिए। इसके साथ ही एक सांस्कृतिक क्रांति की जरुरत है। इसके बिना महिलाओं को एक उन्मुक्त वातावरण नहीं दिया जा सकता।

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