Wednesday, 28 June 2017

अस्तित्व बचाने के लिए चुनौतियों का सामना कर रही राष्ट्रीय नदी गंगा

        राष्ट्रीय नदी गंगा अस्तित्व बचाने के लिए चुनौतियों का सामना कर रही थी। अस्तित्व पर संकट शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से पैदा होनें वाले सीवेज, व्यापारिक प्रदूषण व अऩ्य प्रदूषणों के कारण हुआ हैं। 

      गंगा पाँच राज्यों, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है और कुल 2525 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 8,61,404 वर्ग किलोमीटर है जो देश के कुल क्षेत्रफल का एक चौथाई है। देश की 46 प्रतिशत आबादी गंगा के जलग्रहण क्षेत्र में निवास करती है। यह पाँच राज्यों के 66 जिलों में फैले 118 शहरों तथा 1657 ग्राम पंचायतों से होकर बहती है। गंगा स्वच्छता राष्ट्रीय मिशन की शुरूआत जून 2014 में की गई। इस मिशन को उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के राज्य स्तरीय कार्यक्रम प्रबन्ध समूहों (एसपीएमजी) सहायता प्रदान करते हैं।
      नमामि गंगे योजना के अन्तर्गत सीवर और प्रदूषण प्रबन्धन, नए एसटीपी का निर्माण तथा पुराने एसटीपी का पुनर्वास, ग्राम पंचायतो की पूर्ण स्वच्छ्ता, आदर्श श्मशान घाट-धोबी घाट का निर्माण, जीआईएस स्तर पर निर्णय लेने की प्रणाली का विकास तथा निगरानी और सूचना प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी केन्द्र की स्थापना जो वास्तविक समय पर चेतावनी और पूर्वानुमान प्रदान कर सके जैसी प्रमुख गतिविधियां हैं। 
           लंबी अवधि के संरक्षण और पुनर्जीवन तथा ओ एण्ड एम के अन्तर्गत दस वर्षो के लिए सम्पत्तियों का निर्माण के लिए शत प्रतिशत धन राशि का प्रावधान किया गया है। जैव विविधता, संरक्षण, नदी के प्रवाह, नदी के दोनों किनारो पर औषधीय व स्थानीय पौधों का वनीकरण तथा जलीय जीवों के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। 
         नमामि गंगे योजना के पहले तीन वर्षों में (2014-15 से 2016-17) 3673 करोड़ रुपये की कुल धनराशि खर्च हुई है। चालू वित्त वर्ष (2017-18) में 2300 करोड़ रुपये की धनराशि बजट में आवन्टित की गई है। परन्तु यह देखा गया है कि धनराशि के उपयोग की गति संतोषजनक न है। निविदा में विलम्ब, पुनर्निविदा, जमीन की अनुपलब्धता, कानूनी मामले, प्राकृतिक आपदाएं, सड़क काटने की स्वीकृति में देरी, स्थानीय त्यौहार, अधिक कोष की आवश्यकता तथा राज्य सरकारों द्वारा की जाने वाली अनुशंसा में देरी आदि योजना के कार्यान्वयन की धीमी गति के प्रमुख कारण हैं। 
         आशा है कि संबंधित राज्य के साथ राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन की निरन्तर निगरानी बैठक से योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी और जमीन उपलब्धता तथा निविदा द्वारा योजना की शुरूआत जैसी बाधाओं को दूर किया जा सकेगा। भारत के गजट द्वारा 7 अक्टूबर 2016, को एक आदेश जारी किया गया जिसके तहत पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत आने वाले गंगा नदी (पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबन्धन) प्राधिकरणों को तेज गति से नीति निर्माण व कार्यान्वयन तथा एक नए संस्थागत संरचना निर्माण का प्रावधान है। 
            यह प्रावधान राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन को अपने कार्यों को स्वतन्त्र रूप से तथा जवाबदेही लेकर पूर्ण करने की शक्ति देता है। इस प्राधिकरण का अधिकार क्षेत्र पाँच राज्यों, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा गंगा व उसकी सहायक नदियों तक विस्तृत है।
          सम्पत्ति और जल की गुणवत्ता का समयबद्ध रख-रखाव और पुनर्स्थापना, जल ग्रहण क्षेत्र में लुप्त हो चुके पेड़ पौधों का पुनर्जीवन और प्रबन्धन, गंगा बेसिन में जलीय जीव और तटीय जैव विविधता का पुनर्जीवन और संरक्षण, गंगा के किनारों तथा इसके बाढ क्षेत्र में निर्माण पर प्रतिबन्ध ताकि प्रदूषण के स्रोत कम किया जा सके और भूमिगत जल की फिर से पूर्ति की जा सके, नदी के पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबंधन के लिए लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
            सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों तथा उद्योग निकायों के सहयोग से प्रमुख शहरों में गंगा नदी के तल की सफाई का कार्य प्रारम्भ किया जा चुका है। ग्रामीण स्वच्छता के तहत राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन ने पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को शौचालय निर्माण के लिए 263 करोड़ रुपये उपलब्ध कराये है। अब तक 11 लाख शौचालयों का निर्माण हो चुका है। 
          श्मशान घाटों के निर्माण व आधुनिकीकरण के लिए 20 से 25 शहरी स्थानीय निकायों के सहयोग से प्रतिवर्ष 100 श्मशान घाटों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। केदारनाथ, हरिद्वार, दिल्ली, इलाहाबाद, कानपुर, वाराणसी और पटना में नदी के किनारों-घाटों का विकास कार्य तथा वर्तमान के घाटों की मरम्मत और आधुनिकीकरण कार्य प्रारम्भ हो चुका है।
           अत्यधिक प्रदूषित करने वाले 764 में से 508 शराब, लुग्दी व कागज़, चमड़ा उद्योग, वस्त्र तथा चीनी के कारखानों के लिए वास्तविक समय पर जानकारी देने वाले प्रदूषण निगरानी केन्द्रों की स्थापना की गई है। यह प्रदूषण प्रबन्धन कार्य, मध्यम अवधि योजना के अऩ्तर्गत आरम्भ किया गया है। शराब के कारखानों के द्वारा शून्य द्रव निर्वहन के लिए कार्य योजना 2016 के अऩ्तिम तिमाही से लागू की गई है। 
           केन्द्रीय नियन्त्रण प्रदूषण बोर्ड से सतर्कता विभाग द्वारा बारीकी से निर्देशो के अनुपालन की निगरानी की जा रही है। भारत के वन्य जीव संस्थान के सहयोग से जैव विविधता संरक्षण को लागू किया गया है। जिसके अन्तर्गत स्वर्ण महशीर, डॉल्फ़िन, मगरमच्छ, कछुए और ओटर आदि का संरक्षण शामिल है। वनीकरण कार्यक्रम के तहत 30,000 हैक्टेयर भूमि का लक्ष्य रखा गया है। 
         जल की गुणवत्ता की निगरानी के लिए 57 निगरानी केन्द्रों के अलावा 113 वास्तविक समय निगरानी केन्द्रों की स्थापना की जा रही है जो कुछ निश्चित जगहों पर प्रदर्शन बोर्डों के माध्यम से जानकारी प्रदान करेंगें। पोस्टर, ब्रोशर, पर्चे, होर्डिंग आदि जैसे संसाधन सामग्रियों को हितधारकों के बीच प्रसारित-प्रदर्शित किया गया है। पैदल यात्रा, स्वच्छता अभियान, बच्चों के लिए पेंटिंग प्रतियोगिता, श्रमदान, टॉक-शो और संवाद आदि के माध्यम से जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है।
            एक नमामि गंगे गीत जारी किया गया है। इसके अतिरिक्त दृश्य-श्रव्य के माध्यम से भी जागरुकता फैलाई जा रही है। फेसबुक, ट्वीटर और यू ट्यूब जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों से अद्यतन जानकारी मुहैया कराई जा रही है। जन जागरूकता अभियान, फोटो प्रदर्शनियां, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में मंडप-स्टालों को लगाने की भी शुरुआत की गई है। गंगा नदी में प्रदूषण की निगरानी में जनता की भागीदारी के लिए ‘भुवन-गंग’ वेब ऐप और मोबाइल ऐप का शुभारम्भ किया गया है। 
           गंगा पुनर्जीवन चुनौती की प्रकृति को देखते हुए भारत सरकार के सात मंत्रालय जून 2014 से एक साथ मिलकर कार्य कर रहे है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन और भारत सरकार के 11 मंत्रालयों के बीच समझौता ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षर हुए है ताकि गंगा नदी के पुनर्जीवन और संरक्षण के क्रियाकलापों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया जा सके। 
             भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान परिषद (इसरो) के विभाग राष्ट्रीय रिमोर्ट सेंसिंग केन्द्र के साथ भी समझौता किया गया है। गंगा नदी में प्रदूषण में कमी लाने तथा स्वच्छता अभियान के लिए नीति बनाने वाले उच्च स्तरीय प्राधिकरणों ने बारीकी से निगरानी करने, अपशिष्ट का उत्पादन कम करने तथा पर्यावरण अनुकूल अपशिष्ट निष्पादन और लोगों में बिजली के श्मशान घाट की स्वीकार्यता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है। लोगो को निगरानी की रिपोर्टों से अवगत कराने की अनुशंसा की गई है।

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